प्रेमा

 (9)

तुम सचमुच जादूगर हो

नौ बजे रात का समय था। पूर्णा अँधेरे कमरे में चारपाई पर लेटी हुई करवटें बदल रही है और सोच रही है आखिर वह मुझेस क्या चाहते है? मै तो उनसे कह चुकी कि जहॉँ तक मुझसे हो सकेगा आपका कार्य सिद्व करने में कोई बात उठा न रखूँगी। फिर वह मुझसे कितना प्रेम बढ़ाते है। क्यों मेरे सर पर पाप की गठरी लादते है मै उनकी इस मोहनी सूरत को देखकर बेबस हुई जाती हूँ।

मैं कैसे दिल को समझाऊ? वह तो प्रेम रस पीकर मतवाला हो रहा है। ऐसा कौन होगा जो उनकी जादूभरी बातें सुनकर रीझ न जाय? हाय कैसा कोमल स्वभाव है। ऑंखे कैसी रस से भरी है। मानो हदय में चुभी जाती है।

आज वह और दिनों से अधिक प्रसन्न थे। कैसा रह रहकर मेरी और ताकते थे। आज उन्होने मुझे दो-तीन बार ‘प्यारी पूर्णा’ कहा। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करनेवाले है? नारायण। वह मुझसे क्या चाहते है। इस मोहब्बत का अंत क्या होगा।

यही सोचते-सोचते जब उसका ध्यान परिणाम की ओर गया तो मारे शर्म के पसीना आ गया। आप ही आप बोल उठी।

न……न। मुझसे ऐसा न होगा। अगर यह व्यवहार उनका बढ़ता गया तो मेरे लिए सिवाय जान दे देने के और कोई उपाय नहीं है। मैं जरूर जहर खा लूँगी। नही-नहीं, मै भी कैसी पागल हो गयी हूँ। क्या वह कोई ऐसे वैसे आदमी है। ऐसा सज्जन पुरूष तो संसार में न होगा। मगर फिर यह प्रेम मुझसे क्यों लगाते है। क्या मेरी परीक्षा लेना चाहती है। बाबू साहब। ईश्चर के लिए ऐसा न करना। मै तुम्हारी परीक्षा में पूरी न उतरूँगी।

पूर्णा इसी उधेड़-बुन मे पड़ी थी कि नींद आ गयी। सबेरा हुआ। अभी नहाने जाने की तैयारी कर रही थी कि बाबू अमुतराय के आदमी ने आकर बिल्लो को जोर से पुकारा और उसे एक बंद लिफाफा और एक छोटी सी संदूकची देकर अपनी राह लगा। बिल्लो ने तुरंत आकर पूर्णा को यह चीजें दिखायी।

पूर्णा ने कॉँपते हुए हाथों से खत लिया। खोला तो यह लिखा था—

‘प्राणप्यारी से अधिक प्यारी पूर्णा।

जिस दिन से मैंने तुमको पहले पहल देखा था, उसी दिन से तुम्हारे रसीले नैनों के तीर का घायल हो रहा हूँ और अब घाव ऐसा दुखदायी हो गया है कि सहा नहीं जाता। मैंने इस प्रेम की आग को बहुत दबाया। मगर अब वह जलन असहय हो गयी है। पूर्णा। विश्वास मानो, मै तुमको सच्चे दिल से प्यार करता हूं। तुम मेरे हदय कमल के कोष की मालिक हो। उठते बैठते तुम्हारा मुसकराता हुआ चित्र आखों के सामने फिरा करता है। क्या तुम मुझ पर दया न करोगी? मुझ पर तरस न खाओगी? प्यारी पूर्णा। मेरी विनय मान जाओ। मुझको अपना दास, अपना सेवक बना लो। मै तुमसे कोई अनुचित बात नहीं चाहता। नारायण। कदापि नहीं, मै तुमसे शास्त्रीय रीति पर विवाह करना चाहता हूँ। ऐसा विवाह तुमको अनोखा मालूम होगा। तुम समझोगी, यह धोखे की बात है। मगर सत्य मानो, अब इस देश में ऐसे विवाह कहीं कहीं होने लगे है। मै तुम्हारे विरह में मर जाना पसंद करूँगा, मगर तुमको धोखा न दूंगा।

‘पूर्णा। नही मत करो। मेरी पिछली बातों को याद करो। अभी कल ही जब मैंने कहा कि ‘तुम चाहो तो मेरे सर बहुत जल्द सेहरा बँध सकता है।‘ तब तुमने कहा था कि ‘मै भर शक्ति कोई बात उठा न रखूँगी। अब अपना वादा पूरा करो। देखो मुकर मत जाना।

‘इस पत्र के साथ मैं एक जहाऊ कंगन भेजता हू। शाम को मैं तुम्हारे दर्शन को आऊँगा। अगर यह कंगन तुम्हारी कलाई पर दिखाइ दिया तो समझ जाऊँगा कि मेरी विनय मान ली गयी। अगर नहीं तो फिर तुम्हें मुँह न दिखाऊँगा।

तुम्हारी सेवा का अभिलाषी

अमृतराय।

पूर्णा ने बड़े गौर से इस खत को पढ़ा और शोच के अथाह समुद्र में गोते खाने लगी। अब यह गुल खिला। महापुरूष ने वहॉँ बैठकर यह पाखंड रचा। इस धूर्मपन को देखो कि मुझसे बेर बेर कहते थे कि तुम्हारे ही ऊपर मेरा विवाह ठीक करने का बोझ है, मै बौरी क्या जानूँ कि इनके मन में क्या बात समायी है। मुझसे विवाह का नाम लेते उनको लाज नहीं होती। अगर सुहागिन बनना भाग में बादा होता तो विधवा काहे िो होती। मै अब इनको क्या जवाब दूँ। अगर किसी दूसरे आदमी ने यह गाली लिखी होती तो उसका कभी मुहँ न देखती। मैं क्या सखी प्रेमा से अच्छी हूँ? क्या उनसे सुंदर हूँ?क्या उनसे गुणवती हूँ? फिर यह क्या समझकर ऐसी बाते लिखते है? विवाह करेगे। मै समझ गयी जैसा विवाह होगा। क्या मुझे इतनी भी समझ नहीं? यह सब उनकी धूर्तपन है। वह मुझे अपने घर रक्खा चाहते हैं। मगर ऐसा मुझसे कदापि न होगा। मै तो इतना ही चाहती हूँ कि कभी-कभी उनकी मोहनी मूरत का दर्शन पाया करूँ। कभी-कभी उनकी रसीली बतियॉँ सुना करूँ और उनका कुशल आनंद, सुख समाचार पाया करूँ। बस। उनकी पत्नी बनने के योग्य मै नहीं हूँ। क्या हुआ अगर हदय में उनकी सूरत जम गयी है। मै इसी घर में उनका ध्यान करते करते जान दे दूँगी। पर मोह के बस के आकर मुझसे ऐसा भारी पाप न किया जाएगा। मगर इसमें उन बेचारे का दोष नहीं है। वह भी अपने दिल से हारे हुए है। नहीं मालूम क्यों मुझ अभागिनी में उनका प्रेम लग गया। इस शहर में ऐसा कौन रईस है जो उनको लड़की देने में अपनी बड़ाई न समझे। मगर ईश्वर को न जाने क्या मंजूर था कि उनकी प्रीति मुझसे लगा दी। हाय। आज की सॉँझ को वह आएगे। मेरी कलाई पर कंगन न देखेगे तो दिल मे क्या कहेंगे? कहीं आना-जाना त्याग दें तो मै बिन मारे मर जाऊँ। अगर उनका चित्त जरा भी मेरी ओर से मोटा हुआ, तो अवश्य जहर खा लूगीँ। अगर उनके मन में जरा भी माख आया, जरा भी निगाह बदली, तो मेरा जीना कठिन है।

बिल्लो पूर्णा के मुखड़े का चढ़ाव-उतार बड़े गौर से देख रही थी। जब वह खत पढ़ चुकी तो उसने पूछा—क्या लिखा है बहू?

पूर्णा—(मलिन स्वर में) क्या बताऊँ क्या लिखा है?

बिल्लो—क्यो कुशल तो है?

पूर्णा—हॉँ, सब कुशल ही है। बाबू साहब ने आज नया स्वॉँग रचा।

बिल्लो—(अचंभे से) वह क्या?

पूर्णा—लिखते है कि मुझसे……

उससे और कुछ न कहा गया। बिल्लो समझ गयी। मगर वहीं तक पहुची जहॉँ तक उसकी बुद्वि ने मदद की। वह अमृतराय की बढ़ती हुई मुहब्बत को देख-देखकर दिल में समझे बैठी हुई थी कि वह एक न एक दिन पूर्णा को अपने घर अवश्य डालेगे। पूर्णा उनको प्यार करती है, उन पर जान देती है। वह पहले बहुत हिचकिचायगी मगर अंत मे मान ही जायगी। उसने सैकडो रईसों को देखा था कि नाइनों कहारियो, महराजिनों को घर डाल लिया था। अब की भी ऐसा ही होगा। उसे इसमें कोई बात अनोखी नहीं मालूम होती थी कि बाबू साहब का प्रेम सच्च है मगर बेचारे सिवाय इसके और कर ही क्या सकते है कि पूर्णा को घर डाल लें। देखा चाहिए कि बहू मानती है या नहीं। अगर मान गयीं तो जब तक जियेगे, सुख भोगेगी। मै भी उनकी सेवा में एक टुकड़ा रोटी पाया करूँगी और जो कहीं इनकार किया तो किसी का निबाह न होगा। बाबू साहब ही का सहारा ठहरा। जब वही मुँह मोड़ लेंगे तो फिर कौन किसको पूछता है।

इस तरह ऊँच-नीच सोचकर उसने पूर्णा से पूछा-तुम क्या जवाब दो दोगी?

पूर्णा-जवाब ऐसी बातों का भी भल कहीं जवाब होता है। भला विधवाओं का कहीं ब्याह हुआ है और वही भी ब्रह्ममण का क्षत्रिय से। इस तरह की चन्द कहानियां मैंने उन किताबो में पढ़ी जो वह मुझे दे गये है। मगर ऐसी बात कहीं सैतुक नहीं देखने आयी।

बिल्लो समझी थी कि बाबू साहब उसको घर डरानेवाले है। जब ब्याह का नाम सुना तो चकरा कर बोली-क्या ब्याह करने को कहते है?

पूर्णा-हॉँ।

बिल्लों—तुमसे?

पूर्णा-यही तो आर्श्च है।

बिल्लो—अचराज सा अचरज हैं भला ऐसी कहीं भया है। बालक पक गये मगर ऐसा ब्याह नहीं देखा।

पूर्णा-बिल्लो, यह सब बहाना है। उनका मतलब मैं समझ गयी।

बिल्लो-वह तो खुली बात है।

पूर्णा—ऐसा मुझसे न होगा। मैं जान दे दूँगी पर ऐसा न करुँगी।

बिल्लो—बहू उनका इसमें कुछ दोष नहीं है। वह बेचारे भी अपने दिल से हारे हुए हैं। क्या करें।

पूर्णा—हाँ बिल्लो, उनको नहीं मालूम क्यों मुझसे कुछ मुहब्बत हो गयी है और मेरे दिल का हाल तो तुमसे छिपा नहीं। अगर वह मेरी जान मॉँगते तो मैं अभी दे देती। ईश्वर जानता है, उनके ज़रा से इशारे पर मैं अपने को निछावर कर सकती हूँ।

मगर जो बात व चाहते है मुझसे न होगी। उसके सोचती हूँ तो मेरा कलेजा काँपने लगता है।

बिल्लो—हॉँ, बात तो ऐसा ही है मुदा…

पूर्णा-मगर क्या, भलेमानुसो में ऐसा कभी होता ही नहीं। हॉँ, नीच जातियों में सगाई, डोला सब कुछ आता है।

बिल्लो—बहू यह तो सच है। मगर तुम इनकार करोगी तो उनका दिल टूट जायेगा।

पूर्णा—यही डर मारे डालता है। मगर इनकार न करुँ तो क्या करुँ। यह तो मैं भी जानती हूँ कि वह झूठ-सच ब्याह कर लेंगे। ब्याह क्या कर लेंगे। ब्याह क्या करेंगे, ब्याह का नाम करेंगे। मगर सोचो तो दूनिया क्या कहेगी। लोग अभी से बदनाम कर रहे है, तो न जाने और क्या-क्या आक्षेप लगायेंगे। मैं सखी प्रेमा को मुँह दिखाने योग्स नहीं रहूँगी। बस यही एक उपाय है कि जान दे दूँ, न रह बॉँस न बजें बॉँसुरी। उनको दो-चार दिन तक रंज रहेगा, आखिर भूल जाऐंगे। मेरी तो इज्ज़त बच जायगी।

बिल्लो—(बात पलट कर) इस सन्दूकचे मे’ क्या है?

पूर्णा-खोल कर देखो।

बिल्लो ने जो उसे खोला तो एक क़ीमती कंगन हरी मखमल में लपेटकर धरा था और सन्दूक में संदल की सुगंध आ रही थी। बिल्लो ने उसको निकाल लिया और चाहा की पूर्णा के हथ खींच लिया और ऑंखों में ऑंसू भर कर बोली—मत बिल्लो, इसे मत पहनाओ। सन्दूक में बंद करके रख दो।

बिल्लो—ज़रा पहनो तो देखो कैसा अच्छा मालूम होता है।

पूर्णा—कैसे पहनूँ। यह तो इस बात का सूचक हो जाएगा कि उनकी बात मंजूर है।

बिल्लो-क्या यह भी इस चीठी में लिखा है?

पूर्णा—हॉँ, लिखा है कि मैं आज शाम को आऊँगा और अगर कलाई पर कंगन देखूँगा तो समझ जाऊँगा कि मेरी बात मंजूर है।

बिल्लो—क्या आज ही शाम को आऍंगे?

पूर्णा—हॉँ।

यह कहकर पूर्णा ने सिर नीचा कर लिया। नहाने कौन जाता है। खाने पीने की किसको सुध है। दोपहर तक चुपचाप बैठी सोचा की। मगर दिल ने कोई बात निर्णय न की हॉँ, -ज्यों-ज्यों सॉँझ का समय निकट आया था त्यों-त्यों उसका दिल धड़कता जाता था कि उनके सामने कैसे जाऊँगी। वह मेरी कलाई पर कंगन न देखगें तो क्या कहेंगे? कहीं रुठ कर चले न जायँ? वह कहीं रिसा गये तो उनको कैसे मनाऊँगी?मगर तबिय ता क़ायदा है कि जब कोई बात उसको अति लौलीन करनेवाली होती है तो थोड़ी देर के बाद वह उसे भागने लगती है। पूर्णा से अब सोचा भी न जाता था। माथे पर हाथ घरे मौन साधे चिन्ता की चित्र बनी दीवार की ओर ताक रही थी। बिल्लो भी मान मारे बैठी हुई थी। तीन बजे होंगे कि यकायक बाबू अमृतराय की मानूस आवाज़ दरवाजे पर बिल्लो पुकराते सुनायी दी। बिल्लो चट बाहर दौड़ी और पूर्णा जल्दी से अपनी कोठरी में घुस गयी कि दवाज़ा भेड़ लिया। उसका दिल भर आया और वह किवाड़ से चिमट कर फूट-फूट रोने लगी। उधर बाबू साहब बहुत बेचैन थे। बिल्लो ज्योंही बाहर निकली कि उन्होंने उसकी तरफ़ आस-भरी ऑंखों से देखा। मगर जब उसके चेहरे पर खुशी का कोई चिह्न न दिखायी दिया तो वह उदास हो गये और दबी आवाज़ में बोली—महरी, तुम्हारी उदासी देखकर मेरा दिल बैठा जाता है।

बिल्लो ने इसका उत्तर कुछ न दिया।

अमृतराय का माथा ठनका कि जरुर कुछ गड़बड़ हो गयी। शायद बिगड़ गयी। डरते-डरते बिल्लो से पूछा—आज हमार आदमी आया था?

बिल्लो हा आया था।

अमृत—कुछ दे गया?

बिल्लो—दे क्यों नहीं गया।

अमृत तो क्या हुआ? उसको पहना?

बिल्लो—हॉँ, पहना अरे ऑंख भर के देखा तो हूई नहीं। तब से बैठी रो रही है। न खाने उठी, न गंगा जी गयी।

अमृत—कुछ कहा भी। क्या बहुत खफ़ा है?

बिल्लो—कहतीं क्या? तभी से ऑंसू का तार नहीं टूटा।

अमृतराय समझ गये कि मेरी चाल बुरी पड़ी। अभी मुझे कुछ दिन और धीरज रखना चाहिए था। वह जरुर बिगड़ गयीं। अब क्या करुँ? क्या अपना-सा मुँह ले के लौट जाऊँ? या एक दफा फिर मुलाकात कर लूँ तब लौट जाऊँ कैसे लौटूँ। लौटा जायगा? हाय अब न लौटा जायगा। पूर्णा तू देखने में बहुत सीधी और भोली है, परन्तु तेरा हृदय बहुत कठोर है। तूने मेरी बातों का विश्वास नहीं माना तू समझती है मैं तुझसे कपट कर रहा हूँ। ईश्वर के लिए अपने मन से यह शंका निकाल डाल। मैं धीरे-धीरे तेरे मोह में कैसा जकड़ गया हूँ कि अब तेरे बिना जीना कठिन है। प्यारी जब मैंने तुझसे पहल बातचीत की थी तो मुझे इसकी कोई आशा न थी कि तुम्हारी मीठी बातों और तुम्हारी मन्द मुस्कान का ज़ादू मुझ पर ऐसा चल जायगा मगर वह जादू चल गया। और अब सिवाय तुम्हारे उसे और कौन अतार सकता है। नहीं, मैं इस दरवाज़े से कदापि नहीं हिलूँगा। तुम नाराज़ होगी। झल्लाओगी। मगर कभी न कभी मुझ पर तरस आ ही जायगा। बस अब यही करना उचित है । मगर देखी प्यारी, ऐसा न करना कि मुझसे बात करना छोड़ दो। नहीं तो मेरा कहीं ठिकाना नहीं। क्या तुम हमसे सचमुच नाराज़ हो। हाय क्या तुम पहरों से इसलिए रो रही हो कि मेरी बातों ने तुमको दुख दिया।

यह बातें सोचते-सोचते बाबू साहब की ऑंखों में ऑंसू भर आये और उन्होंने गदगद स्वर में बिल्लो से कहा—महरी, हो सके तो ज़रा उनसे मेरी मुलाक़ात करा दो। कह दो एक दम के लिए मिल जायें। मुझ पर इतनी कृपा करो।

महरी ने जो उनकी ऑंखें लाल देखीं तो दौड़ हुई घर में आयी पूर्णा के कमरे में किवाड़ खटखटाकर बोली—बहू, क्या ग़ज़ब करती हो, बाहर निकलो, बेचारे खड़े रो रहे हैं।

पूर्णा ने इरादा कर लिया था कि मैं उनके सामने कदापि न जाऊँगी। वह महरी से बातचीत करके आप ही चले जायँगे। मगर जब सुना कि रो रहे है तो प्रतिज्ञा टूट गयी। बोली—तुमन जा के क्या कह दिया?

महरी—मैंन तो कुछ भी नहीं कहा।

पूर्णा से अब न रहा गया। चट किवाड़ खोल दिये। और कॉँपती हुई आवाज़ से बोली-सच बतलाओ बिल्लो, क्या बहुत रो रहे है?

महरी-नारायण जाने, दोनों ऑंखें लाल टेसू हो गयी हैं। बेचारे बैठे तक नहीं। उनको रोते देखकर मेरा भी दिल भर आया।

इतने में बाबू अमृतराय ने पुकार कर कहा—बिल्लो, मैं जाता हूँ। अपनी सर्कार से कह दो अपराध क्षमा करें।

पूर्णा ने आवाज़ सुनी। वह एक ऐसे आदमी की आवाज़ थी जो निराशा के समुद्र में डूबता हो। पूर्णा को ऐसा मालूम हुआ जैसे उसके हृदय को किसी ने छेद दिया। ऑंखों से ऑंसू की झड़ी लग गयी। बिल्लों ने कहा—बहू, हाथ जोड़ती हूँ, चली चलो जिसमें उनकी भी खातिरी हो जाए।

यह कहकर उसने आप से उठती हुई पूर्णा का हाथ पकड़ कर उठाया और वह घूँघट निकाल कर, ऑंसू पोंछती हुई, मर्दाने कमरे की तरफ चली। बिल्लो ने देखा कि उसके हाथों में कंगन नहीं है। चट सन्दूकची उठा लायी और पूर्णा का हाथ पकड़ कर चाहती थी कि कंगन पिन्हा दे। मगर पूर्णा ने हाथ झटक कर छुड़ा लिया और दम की दम में बैठक के भीतर दरवाज़े पर आके खड़ी रो रही थी। उसकी दोनों ऑंखें लाल थी और ताजे ऑंसुओ की रेखाऍं गालों पर बनी हुई थी। पूर्णा ने घूँघट उठाकर प्रेम-रस से भरी हुई ऑंखों से उनकी ओर ताका। दोनों की ऑंखें चार हुई। अमृतराय बेबस होकर बढ़े। सिसकती हुई पूर्णा का हाथ पकड़ लिया और बड़ी दीनता से बोले—पूर्णा, ईश्वर के लिए मुझ पर दया करो।

उनके मुँह से और कुछ न निकला। करुणा से गला बँध गया और वह सर नीचा किये हुए जवाब के इन्तिजार में खड़ा हो गये। बेचारी पूर्णा का धैर्य उसके हाथ से छूट गया। उसने रोते-रोते अपना सर अमृतराय के कंधे पर रख दिया। कुछ कहना चाहा मगर मुँह से आवाज़ न निकली। अमृतराय ताड़ गये कि अब देवी प्रसन्न हो गयी। उन्होंने ऑंखों के इशारे से बिल्लो से कंगन मँगवाया। पूर्णा को धीरेस कुर्सी पर बिठा दिया। वह जरा भी न झिझकी। उसके हाथों में कंगन पिन्हाये, पूर्णा ने ज़रा भी हाथ न खींचा। तब अमृतराय न साहसा करके उसके हाथों को चूम लिया और उनकी ऑंखें प्रेम से मग्न होकर जगमगाने लगीं। रोती हुई पूर्णा ने मोहब्बत-भरी निगाहों से उनकी ओर देखा और बोली—प्यार अमृतराय तुम सचमुच जादूगर हो।

(10)

विवाह हो गया

यह ऑंखों देखी बात है कि बहुत करके झुठी और बे-सिर पैर की बातें आप ही आप फैल जाया करती है। तो भला जिस बात में सच्चाई नाममात्र भी मिली हो उसको फैलते कितनी देर लगती है। चारों ओर यही चर्चा थी कि अमृतराय उस विधवा ब्राह्मणी के घर बहुत आया जाया करता है। सारे शहर के लोग कसम खाने पर उद्यत थे कि इन दोनों में कुछ सॉँठ-गॉँठ जरुर है। कुछ दिनों से पंडाइन औरचौबाइन आदि ने भी पूर्णा के बनाव-चुनाव पर नाक-भौं चढ़ाना छोड़ दिया था। क्योंकि उनके विचार में अब वह ऐसे बन्धनों की भागी थी। जो लोग विद्वान थे और हिन्दुस्तान के दूसरे देशों के हाल जानते थे उनको इस बात की बड़ी चिन्ता थी कि कहीं यह दोनों नियोग न करे लें। हज़ारों आदमी इस घात मे थे कि अगर कभी रात को अमृतराय पूर्णा की ओर जाते पकड़े जायँ तो फिर लौट कर घर न जाने पावें। अगर कोई अभी तक अमृतराय की नीयत की सफाई पर विश्वास रखता था तो वह प्रेमा थी। वह बेचारी विराहग्नि में जलते-जलते कॉँटा हो गई थी, मगर अभी तक उनकी मुहब्बत उसके दिल में वैसी ही बनी हुई थी। उसके दिल में कोई बैठा हुआ कह रहा था कि तेरा विवाह उनसे अवश्य होगौ। इसी आशा पर उसके जीवन का आधार था। वह उन लोगों में थी जो एक ही बार दिल का सौदा चुकाते है।

आज पूर्णा से वचन लेकर बाबू साहब बँगले पर पहुँचने भी न पाये थे कि यह ख़बर एक कान से दूसरे कान फैलने लगी और शाम होते-होते सारे शहर में यही बात गूँजने लगी। जो कोई सुनता उसे पहले तो विश्वास न आता। क्या इतने मान-मर्यादा के ईसाई हो गये हैं, बस उसकी शंका मिट जाती। वह उनको गालियॉँ देता, कोसता। रात तो किसी तरह कटी। सवेरा होते ही मुंशी बदरीप्रसाद के मकान पर सारे नगर के पंडित, विद्वान ध्नाढ़य और प्रतिष्ठित लोग एकत्र हुए और इसका विचार होने लगा कि यह शादी कैसे रोकी जाय।

पंडित भृगुदत्त—विधवा विवाह वर्जित हैं कोई हमसे शास्त्रर्थ कर ले। वेदपुराण में कहीं ऐसा अधिकार कोई दिखा दे तो हम आज पंडिताई करना छोड़ दें।

इस पर बहुत से आदमी चिल्लाये, हॉँ, हॉँ, जरुर शास्त्रार्थ हो।

शास्त्रर्थ का नाम सुनते ही इधर-उधर से सैकड़ों पंडित विद्यार्थी बग़लों में पोथियां दबाये, सिर घुटाये, अँगोछा कँधे पर रक्खे, मुँह में तमाकू भरे, इकट्टे हो गये और झक-झक होने लगी कि ज़रुर शास्त्रर्थ हो। पहले यह श्लोक पूछा जाय। उसका यह उत्तर दें तो फिर यह प्रश्न किया जावे। अगर उत्तर देने में वह लोग साहित्य या व्याकरण में ज़रा भी चूके तो जीत हमारे हाथ हो जाय। सैंकड़ों कठमुल्ले गँवार भी इसी मण्डली में मिलकर कोलाहल मचा रहे थे। मुँशी बदरीप्रसाद ने जब इनको शास्त्रर्थ करने पर उतारु देखा तो बोले—किस से करोगे शास्त्रार्थ? मान लो वह शास्त्रार्थ न करें तब?

सेठ धूनीमल—बिना शास्त्रार्थ किये विवाह कर लेगें (धोती सम्हाल कर) थाने में रपट कर दूँगा।

ठंकुर जोरावर सिंह—(मोछों पर ताव देकर) कोई ठट्ठा है ब्याह करना, सिर काट डालूँगा। लोहू की नदी बह जायगी।

राव साहब—बारता की बारात काट डाली जायगी।

इतने में सैकड़ों आदमी और आ डटे। और आग में ईधन लगाने लगे।

एक—ज़रुर से ज़रुर सिर गंजा कर दिया जाए।

दूसरा—घर में आग लगा देंगे। सब बारात जल-भुन जायगी।

तीसरा—पहले उस यात्री का गला घोंट देंगे।

इधर तो यह हरबोंग मचा हुआ था, उधर दीवानखाने में बहुत से वकील और मुखतार रमझल्ला मचा रहे थे। इस विवाह को न्याय विरुद्ध साबित करने के लिए बड़ा उद्योग किया जा रहा था। बड़ी तेज़ी से मोटी-मोटी पुस्तकों के वरक उलटे जा रहे थे। बरसों की पुरानी-धुरानी नज़ीरे पढ़ी जा रही थी कि कहीं से कोई दाँव-पकड़ निकल आवे। मगर कई घण्टे तक सर ख़पाने पर कुछ न हो सका। आखिर यह सम्मति हुई कि पहले ठाकुर ज़ोरावर सिंह अमृतराय का धमकावें। अगर इस पर भी वह न मानें तो जिस दिन बारात निकले सड़क पर मारपीट की जाय। इस प्रस्ताव के बाद न मानों तो विसर्जन हुई। बाबू अमृतराय बयाह की तैयारियों में लगे हुए थे कि ठाकुर ज़ोरावर सिंह का पत्र पहुँचा। उसमें लिखा था—

‘बाबू अमृतराय को ठाकुर ज़ोरावर सिंह का सलाम-बंदगी बहुत-बहुत तरह से पहुँचे। आगे हमने सुना है कि आप किसी विधवा ब्राह्मणी से विवाह करने वाले है। हम आपसे कहे देते हैं कि भूल कर भी ऐसा न कीजिएगा। नहीं तो आप जाने और आपका काम।’

ज़ोरावर सिंह एक धनाढ़य और प्रतिष्ठित आदमी होने के उपरान्त उस शहर के लठैंतों और बॉँके आदमियों का सरदार था और कई बेर बड़े-बड़ों को नीचा दिखा चुका था। असकी धमकी ऐसी न थी कि अमृतराय पर उसका कुछ असर न पड़ता। चिट्ठी को देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। सोचना लगे कि ऐसी कौन-सी चाल चलूँ कि इसको अपना आदमी बना लूँ कि इतने में दूसरी चिट्ठी पहुँची। यह गुमनाम थी और सका आशा भी पहली चिट्ठी से मिलता था। इसके बाद शाम होते-होते सैंकड़ो गुमनाम चिट्टियॉँ आयीं। कोई की कहता था कि अगर फिर ब्याह का नाम लिया तो घर में आग लगा देंगे। कोई सर काटने की धमकी देता था। कोई पेट में छुरी भोंकने के लिए तैयार था। ओर कोई मूँछ के बात उखाड़ने के लिए चुटकियॉँ गर्म कर रहा था। अमृतराय यह तो जानते कि शहरवाले विरोध अवश्य करेंगे मगर उनको इस तरह की राड़ का गुमान भी न था। इन धमकियों ने ज़रा देर के लिए उन्हें भय में डाल दिया। अपने से अधिक खटका उनको पूर्णा के बारे में था कि कहीं यही सब दुष्ट उसे न कोई हानि पहुँचावें। उसी दम कपड़े पहिन, पैरगाड़ी पर सवांर होकर चटपट मजिस्ट्रेट की सेवा में उपस्थित हुए और उनसे पूरा-पूरा वृत्तान्त कहा। बाबू साहब का अंग्रेंजों में बहुत मान था। इसलिए नहीं कि वह खुशामदी थे या अफसरों की पूजा किया करते थे किन्तु इसलिए कि वह अपनी मर्यादा रखना आप जानते थे। साहब ने उनका बड़ा आदर किया। उनकी बातें बड़े ध्यान से सुनी। सामाजिक सुधार की आवश्कता को माना और पुलिस के सुपरिण्टेण्डेट को लिखा कि आप अमृतराय की रक्षा के वास्ते एक गारद रवाना कीजिए और ख़बर लेते रहिए कि मारपीट, खूनखराब न हो जाय। सॉँझ होते—होते तीस सिपाहियों का एक गारद बाबू साहब के मकान पर पहुँच गया, जिनमें से पॉँच बलवान आदमी पूर्णा के मकान की हिफ़ाजत करने के लिए भेज गये।

शहरवालों ने जब देखा कि बाबू साहब ऐसा प्रबन्ध कर रहे है तो और भी झल्लाये। मुंशी बदरीप्रसाद अपने सहायकों को लेकर मजिस्ट्रेट के पास पहुँचे और दुहाई मचाई कि अगर वह विवाह रोक न दिया गया तो शहर में बड़ा उपद्रव होगा और बलवा हो जाने का डर हैं। मगर साहब समझ गये कि यह लोग मिलजुल कर अमृतराय को हानि पहुँचाया चाहते हैं। मुंशी जी से कहा कि सर्कार किसी आदमी की शादी-विवाह में विघ्न डालना नियम के विरुद्ध है। जब तक कि उस काम से किसी दूसरे मनुष्य को कोई दुख न हो। यह टका-सा जवाब पाकर मुंशी जी बहुत लज्जित हुए। वहॉँ से जल-भुनकर मकान पर आये और अपने सहायकों के साथ बैठकर फैसला किया कि ज्यों ही बारात निकले, उसी दम पचास आदमी उस पर टूट पड़ें। पुलिसवालों की भी खबर लें और अमृतराय की भी हड्डी-पसली तोड़कर धर दें।

बाबू अमृतराय के लिए यह समय बहुत नाजु क था। मगर वह देश का हितैषी तन-मन-धन से इस सुधार के काम में लगा हुआ था। विवाह का दिन आज से एक सप्ताह पीछे नियत किया गया। क्योंकि ज्यादा विलम्ब करना उचित न था और यह सात दिन बाबू साहब ने ऐसी हैरानी में काटे कि जिसक वर्णन नहीं किया जासकात। प्रतिदिन वह दो कांस्टेबिलों के साथ पिस्तौलों की जोड़ी लगयो दो बेर पूर्णा के मकान पर आते। वह बेचारी मारे डर के मरी जाती थी। वह अपने को बार-बार कोसती कि मैंने क्यों उनको आशा दिलाकर यह जोखिम मोल ली। अगर इन दुष्टों ने कहीं उन्हें कोई हानि पहुँचाई तो वह मेरी ही नादानी का फल होगा। यद्यपि उसकी रक्षा के लिए कई सिपाही नियत थे मगर रात-रात भर उसकी ऑंखों में नींद न आती। पत्ता भी खड़कता तो चौंककर उठ बैठती। जब बाबू साहब सबेरे आकर उसको ढारस देते तो जाकर उसके जान में जान आती।

अमृतराय ने चिट्टियॉँ तो इधर-उधर भेज ही दी थीं। विवाह के तीन-चार दिन पहले से मेहमान आने लगे। कोई मुम्बई से आता था, कोई मदरास से, कोई पंजाब से और कोई बंगाल से । बनारस में सामाजिक सुधार के विराधियों का बड़ा ज़ोर था और सारे भारतवर्ष के रिफ़र्मरों के जी में लगी हुई थी कि चाहे जो हो, बनारस में सुधार के चमत्कार फैलाने का ऐसा अपूर्व समय हाथ से न जाने देना चाहिए, वह इतनी दूर-दूर से इसलिए आते थे कि सब काशी की भूमि में रिफार्म की पताका अवश्य गाड़ दें। वह जानते थे कि अगर इस शहर में यह विवाह हो तो फिर इस सूबें के दूसरे शहरों के रिफार्मरों के लिए रास्ता खुल जायगा। अमृताराय मेहमानों की आवभगत में लगे हुए थे। और उनके उत्साही चेले साफ-सुथरे कपड़े पहने स्टेशन पर जा-जाकर मेहमानों को आदरपूर्वक लाते और उन्हें सजे हुए कमरों में ठहराते थे। विवाह के दिन तक यहॉँ कोई डेढ़ सौ मेहमान जमा हो गये। अगर कोई मनुष्य सारे आर्यावर्त की सभ्यता, स्वतंत्रता, उदारता और देशभक्ति को एकत्रित देखना चाहता था तो इस समय बाबू अमृतराय के मकान पर देख सकता था। बनारस के पुरानी लकीर पीटने वाले लोग इन तैयारियों और ऐसे प्रतिष्ठित मेहमानों को देख-देख दॉँतों उँगली दबाते। मुंशी बदरीप्रसाद और उनके सहायकों ने कई बेर धूम-धाम से जनसे किये हरबेर यही बात तय हुई कि चाहे जो मारपीट ज़रुर की जाय। विवाह क पहले शाम को बाबू अमृतराय अपने साथियों को लेकर पूर्णा के मकान पर पहुँचे और वहॉँ उनको बरातियों के आदर-सम्मान का प्रबंध करने के लिए ठहरा दिया। इसके बाद पूर्णा के पास गये। इनको देखते ही उसकी ऑंखें में ऑंसू भर आये।

अमृत—(गले से लगाकर) प्यारी पूर्णा, डरो मत। ईश्वर चाहेगा तो बैरी हमारा बाल भी बॉंका न करा सकें। कल जो बरात यहॉँ आयेगी वैसी आज तक इस शहर मे किसी के दरवाज़े पर न आयी होगी।

पूर्णा—मगर मैं क्या करुँ। मुझे मो मालूम होता है कि कल जरुर मारपीट होगी। चारों ओ से यह खबर सुन-सुन मेरा जी आधा हो रहा है। इस वक्त भी मुंशी जी के यहॉँ लाग जमा हैं।

अमृत—प्यारी तुम इन बातों को ज़रा भी ध्यान में न लाओं। मुंशी जी के यहॉँ तो ऐसे जलसे महीनों से हो रहे हैं और सदा हुआ करेंगे। इसका क्या डर। दिल को मजबूत रक्खो। बस, यह रात और बीच है। कल प्यारी पूर्णा मेरे घर पर होगी। आह वह मेरे लिए कैसे आन्नद का समय होगा।

पूर्णा यह सुनकर अपना डर भूल गयी। बाबू साहब को प्यारी की निगाहों से देखा और जब चलने लगे तो उनके गले से लिपट कर बोली—तुमको मेरी कसम, इन दुष्टों से बचे रहाना।

अमृतराय ने उसे छाती से लगा लिया और समझा-बुझाकर अपने मकान को रवाना हुए।

पहर रात गये, पूर्णा के मकान पर, कई पंडित रेश्मी बाना सजे, गले में फूलों का हार डाले आये विधिपूर्वक लक्ष्मी की पूजा करने लगे। पूर्णा सोलहों सिंगार किये बैठी हुई थी। चारों तरफ गैस की रोशनी से दिन के समान प्रकाश हो रहा था। कांस्टेबिल दरवाज़े पर टहल रहे थे। दरवाजे का मैदान साफ किया जा रहा था और शामियाना खड़ा किया जा रहा था। कुर्सियॉँ लगायी जा रही थीं, फर्श बिछाया गया, गमले सजसये गये। सारी रात इन्हीं तैयारियों में कटी और सबेरा होते ही बारात अमृतराय के घर से चली।

बारात क्या थी सभ्यता और स्वाधीनता की चलती-फिरती तस्वीर थी। न बाजे का धड़-धड़ पड़-पड़, न बिगुलों की धों धों पों पों, न पालकियों का झुर्मट, न सजे हुए घोड़ों की चिल्लापों, न मस्त हाथियों का रेलपेल, न सोंटे बल्लमवालों की कतारा, न फुलवाड़ी, न बगीचे, बल्कि भले मानुषों की एक मंडली थी जो धीरे-धीरे कदम बढ़ाती चली जा रही थी। दोनों तरफ जंगी पुलिस के आदमी वर्दियॉँ डॉँटे सोंटे लिये खड़े थे। सड़क के इधर-उधर झुंड के झुंड आदमी लम्बी-लम्बी लाठियॉँ लिये एकत्र और थे बारात की ओर देख-देख दॉँत पीसते थे। मगर पुलिस का वह रोब था कि किसी को चूँ करने का भी साहस नहीं होता था। बारातियों से पचास कदम की दूरी पर रिजर्व पुलिस के सवार हथियारों से लैंस, घोड़ों पर रान पटरी जामये, भाले चमकाते ओर घोड़ों को उछालते चले जाते थे। तिस पर भी सबको यह खटका लग हुआ था कि कहीं पुलिस के भय का यह तिलिस्म टूट न जाय। यद्यपि बारातियों के चेहरे से घबराहट लेशमात्र भी न पाई जाती थी तथापि दिल सबके धड़क रहे थे। ज़रा भी सटपट होती तो सबके कान खड़े हो जाते। एक बेर दुष्टों ने सचमुच धावा कर ही दिया। चारों ओर हलचल मचगी। मगर उसी दम पुलिस ने भी डबल मार्च किया और दम की दम मे कई फ़सादियों की मुशके कस लीं। फिर किसी को उपद्रव मचाने का साहस न हुआ। बारे किसी तरह घंटे भर में बारात पूर्णा के मकान पर पहुँची। यहॉँ पहले से ही बारातियों के शुभागमन का सामान किया गया था। ऑंगन में फर्श लगा हुआ था। कुर्सियॉँ धरी हुई थीं ओर बीचोंबीच में कई पूज्य ब्रह्मण हवनकुण्ड के किनारे बैठकर आहुति दे रहे थे। हवन की सुगन्ध चारों ओर उड़ रही थी। उस पर मंत्रों के मीठे-मीठे मध्यम और मनोहर स्वर जब कान में आते तो दिल आप ही उछलने लगता। जब सब बारती बैठ गये तब उनके माथे पर केसर और चन्दन मला गया। उनके गलों में हार डाले गये और बाबू अमृतराय पर सब आदमीयों ने पुष्पों की वर्षा की। इसके पीछे घर मकान के भीतर गया और वहॉँ विधिपूर्वक विवाह हुआ। न गीत गाये गये, न गाली-गलौज की नौबत आयी, न नेगचार का उधम मचा।

भीतर तो शादी हो रही थी, बाहर हज़ारों आदमी लाठियॉँ और सोंटे लिए गुल मचा रहे थे। पुलिसवाले उनको रोके हुए मकान के चौगिर्द खड़े थे। इसी बची में पुलिस का कप्तान भ आ पहुँचा।उसने आते ही हुक्म दिया कि भीड़ हटा दी जाय। और उसी दम पुलिसवालों ने सोंटों से मारमार कर इस भीड़ को हटाना शुरु किया। जंगी पुलिस ने डराने के लिए बन्दूकों की दो-चार बाढ़े हवा में सर कर दी। अब क्या था, चारो ओर भगदड़ मच गयी। लोग एक पर एक गिरने लगे। मगर ठीक उसी समय ठाकुर जोरावर सिंह बाँकी पगिया बॉँधें, रजपूती बाना सजे, दोहरी पिस्तौल लगाये दिखायी, दिया। उसकी मूँछें खड़ी थी। ऑंखों से अंगारे उड़ रहे थे। उसको देखते ही वह लोब जो छितिर-बिति हो रहे थे फिर इकट्ठा होने लगो। जैसे सरदार को देखकर भागती हुई सेना दम पकड़ ले। देखते ही देखते हज़ार आदमी से अधिक एकत्र हो गये। और तलवार के धनी ठाकुर ने एक बार कड़क कर कहा—‘जै दुर्गा जी की वहीं सारे दिलों में मानों बिजली कौंध गयी, जोश भड़क उठा। तेवरियों पर बल पड़ गये और सब के सब नद की तरह उमड़ते हुए आगे को बढ़े। जंगी पुलिसवाले भी संगीने चढ़ाये, साफ़ बॉँधे, डटे खड़े थे। चारों ओर भयानक सन्नाटा छाया हुआ था। धड़का लगा हुआ था कि अब कोई दम में लोहू की नदी बहा चाहती है। कप्तान ने जब इस बाढ़ को अपने ऊपर आते देखा तो अपने सिपाहियों को ललकारा और बड़े जीवट से मैदान में आकर सवारों को उभारने लगा कि यकायक पिस्तौल की आवाज़ आयी और कप्तान की टोपी ज़मीन पर गिर पड़ी मगर घाव ओछा लगा। कप्तान ने देख लिया था। कि यह पिस्तौल जोरावर सिंह ने सर की है। उसने भी चट अपनी बन्दूक सँभाली ओर निशाने का लगाना था कि धॉँय से आवाज़ हुई ओर जोरावर सिंह चारों खाने चित्त जमीन पर आ रहा। उसके गिरते ही सबके हियाव छूट गये। वे भेड़ों की भॉँति भगाने लगे। जिसकी जिधर सींग समाई चल निकला। कोई आधा घण्टे में वहॉँ चिड़िया का पूत भी न दिखायी दिया।

बाहर तो यह उपद्रव मचा था, भीतर दुलहा-दुलहिन मारे डर के सूखे जाते थे। बाबू अमृतराय जी दम-दम की खबर मँगाते और थर-थर कॉँपती हुई पूर्णा को ढारस देते। वह बेचारी रो रही थी कि मुझ अभागिनी के लिए माथा पिटौवल हो रही है कि इतने में बन्दूक छूटी। या नारायण अब की किसकी जान गई। अमृतराय घबराकर उठे कि ज़रा बाहर जाकर देखें। मगर पूर्णा से हाथ न छुड़ा सके। इतने मेंएक आदमी ने फिर आकर कहा—बाबू साहब ठाकूर ढेर हो गये। कप्तान ने गोली मार दी।

आधा घण्टे में मैदान साफ़ हो गया और अब यहॉँ से बरात की बिदाई की ठहरी। पूर्णा और बिल्लो एक सेजगाड़ी में बिठाई गई और जिस सज-धज से बरात आयी थी असी तरह वापस हुई। अब की किसी को सर उठाने का साहस नहीं हुआ। इसमें सन्देह नहीं कि इधर-उधर झुंड आदमी जमा थे और इस मंडली को क्रोध की निगाहों से देख रहे थे। कभी-कभी मनचला जवान एकाध पत्थर भी चला देता था। कभी तालियॉँ बजायी जाती थीं। मुँह चिढ़ाया जाता था। मगर इन शरारतो से ऐसे दिल के पोढ़े आदमियों की गम्भीरता में क्या विध्न पड़ सकता था। कोई आधा घण्टे में बरात ठिकाने पर पहुँची। दुल्हिन उतारी गयी ओर बरातियां की जान में जान अयी। अमृतराय की खुशी का क्या पूछना। वह दौड़-दौड़ सबसे हाथ मिलाते फिरते थे। बॉँछें खिली जाती थीं। ज्योंही दुल्हिन उस कमरे में पहुँची जो स्वयं आप ही दुल्हिन की तरह सजा हुआ था तो अमृतराय ने आकर कहा—प्यारी, लोहम कुशल से पहुँच गये। ऐं, तुम तो रो रही हो…यह कहते हुए उन्होंने रुमाल से उसके ऑंसू पोछे और उसे गलेसे लगाया।

प्रेम रस की माती पूर्णा ने अमृतराय का हाथ पकड़ लिया और बोली—आप तो आज ऐसे प्रसन्नचित्त हैं, मानो कोई राज मिल गया है।

अमृत—(लिपटाकर) कोई झूठ है जिसे ऐसी रानी मिले उसे राज की क्या परवाह

आज का दिन आनन्द में कटा। दूसरे दिन बरातियों ने बिदा होने की आज्ञा मॉँगी। मगर अमृतराय की यह सलाह हुई कि लाला धनुषधारीलाल कम से कम एक बार सबको अपने व्याख्यान से कृतज्ञ करें यह सलाह सबो पसंद आयी। अमृतराय ने अपने बगीचे में एक बड़ा शामियान खड़ा करवाया और बड़े उत्सव से सभा हुई। वह धुऑंधर व्याख्यान हुए कि सामाजिक सुधार का गौरव सबके दिलों में बैठे गया। फिर तो दो जलसे और भी हुए और दूने धूमधाम के साथ। सारा शहर टूटा पड़ता था। सैंकड़ों आदमियों का जनेऊ टूट गया। इस उत्सव के बाद दो विधवा विवाह और हुए। दोनों दूल्हे अमृतराय के उत्साही सहायकों में थे और दुल्हिनों में से एक पूर्णा के साथ गंगा नहानेवाली रामकली थी। चौथे दिन सब नेवतहरी बिदा हुए। पूर्णा बहुत कन्नी काटती फिरी, मगर बरातियों के आग्रह से मज़बूर होकर उनसे मुलाकात करनी ही पड़ी। और लाला धनुषधारीलाल ने तो तीन दिन उसे बराबर स्त्री-धर्म की शिक्षा दी।

शादी के चौथे दिन बाद पूर्णा बैठी हुई थी कि एक औरत ने आकर उसके एक बंद लिफ़ाफा दिया। पढ़ा तो प्रेमा का प्रेम-पत्र था। उसने उसे मुबारकबादी दी थी और बाबू अमृतराय की वह तसवीर जो बरसों से उसके गले का हार हो रही थी, पूर्णा के लिए भेज दी थी। उस ख़त की आखिरी सतरें यह थीं—

‘सखी, तुम बड़ी भाग्यवती हो। ईश्वर सदा तुम्हारा सोहाग कायम रखें। तुम्हारे पति की तसवीर तुम्हारे पास भेजती हूँ। इसे मेरी यादगार समझाना। तुम जानती हो कि मैं इसको जान से ज्यादा प्यारी समझती रही। मगर अब मैं इस योग्य नही कि इसे अपने पास रख सकूँ। अब यह तुमको मुबारक हो। प्यारी, मुझे भूलना मत । अपने प्यारे पति को मेरी ओर से धन्यवाद देना।

तुम्हारी अभागिनी सखी—

‘प्रेमा’

अफसोस आज के पन्द्रवे दिन बेचारी प्रेमा बाबू दाननाथ के गले बॉँधी दी गयी। बड़े धूमधम से बरात निकली। हज़ारों रुपया लुटा दिया गया। कई दिन तक सारा शहर मुंशी बदरीप्रसाद के दरवाज़े पर नाच देखता रहा। लाखों का वार-न्यारा हो गया। ब्याह के तीसरे ही दिन मुंशी जी परलोक को सिधारे। ईश्वर उनको स्वर्गवास दे।

(11)

विरोधियों का विरोध

मेहमानों के बिदा हो जाने के बाउ यह आशा की जाती थी कि विरोधी लोग अब सिर न उठायेंगे। विशेष इसलिए कि ठाकुर जोरावार सिंह और मुंशी बदरीप्रसाद के मर जाने से उनका बल बहुत कम हो गया था। मगर यह आशा पूरी न हुई। एक सप्ताह भी न गुज़रने पाया था कि और अभी सुचित से बैठने भी न पाये थे कि फिर यही दॉँतकिलकिल शुरु हो गयी।

अमृतराय कमरे में बैठे हुए एक पत्र पढ़ रहे थे कि महराज चुपके से आया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। अमृतराय ने सर उठाकर उसको देखा तो मुसकराकर बोले—कैसे चले महाराज?

महराज—हजूर, जान बकसी होय तो कहूँ।

अमृत—शौक से कहो।

महराज—ऐसा न हो कि आप रिसहे हो जायँ।

अमृत—बात तो कहो।

महराज—हजूर, डर लगती है।

अमृत—क्या तनख्वाह बढ़वाना चाहते हो?

महराज—नाहीं सरकार

अमृत—फिर क्या चाहते हो?

महराज—हजूर,हमारा इस्तीफा ले लिया जाय।

अमृत—क्या नौकरी छोड़ोगे?

महराज—हॉँ सरकार। अब हमसे काम नहीं होता।

अमृत—क्यों, अभी तो मजबूत हो। जी चाहे तो कुछ दिन आराम कर लो। मगर नौकरी क्यों छोड़ों

महराज—नाहीं सरकार, अब हम घर को जाइब।

अमृत—अगर तुमको यहॉँ कोई तकलीफ़ हा तो ठीक-ठीक कह दो। अगर तनख्वाह कहीं और इसके ज्यादा मिलने की आशा हो तो वैसा कहो।

महराज—हजूर, तनख्यावह जो आप देते हैं कोई क्या माई का लाल देगा।

अमृतराय—फिर समझ में नहीं आता कि क्यों नौकरी छोड़ना चहाते हो?

महराज—अब सरकार, मैं आपसे क्या कहूँ। यहॉँ तो यह बातें हो रही थीं उधर चम्मन व रम्मन कहार और भगेलू व दुक्खी बारी आपस में बातें कर रहे थे।

भगेलू—चलो, चलो जल्दी। नहीं तो कचहरी की बेला आ जैहै।

चम्मन—आगे-आगे तुम चलो।

भगेलू—हमसे आगूँ न चला जैहै।

चम्मन—तब कौन आगूँ चलै?

भगेलू—हम केका बताई।

रम्मन—कोई न चलै आगूँ तो हम चलित है।

दुक्खी—तैं आगे एक बात कहित है। नह कोई आगूँ चले न कोई पीछूँ।

चम्मन—फिर कैसे चला जाय।

भगेलू—सब साथ-साथ चलैं।

चम्मन—तुम्हार क़पार

भगेलू—साथ चले माँ कौन हरज है?

मम्मन—तब सरकार से बतियाये कौन?

भगेलू—दुक्खी का खूब बितियाब आवत है।

दुक्खी—अरे राम रे मैं उनके ताई न जैहूँ। उनका देख के मोका मुतास हो आवत है।

भगेलू—अच्छा, कोऊ न चलै तो हम आगूँ चलित हैं

सब के सब चले। जब बरामदे में पहुँचे तो भगेलू रुक गया।

मम्मन—ठाढ़े काहे हो गयो? चले चलौ।

भगेलू—अब हम न जाबै। हमारा तो छाती धड़त है।

अमृतराय ने जो बरामदे में इनको सॉँय-साँय बातें करते सुना तो कमरे से बाहर निकल आये और हँस कर पूछा—कैसे चले, भगेलू?

भगेलू का हियाव छूट गया। सिर नीचा करके बोला—हजूर, यह सब कहार आपसे कुछ कहने आये है।

अमृतराय—क्या कहते है? यह सब तो बोलते ही नहीं

भगेलू—(कहारों से) तुमको जौन कुछ कहना होय सरकार से कहो।

कहार भगेलू के इस तरह निकल जाने पर दिल में बहुत झल्लये। चम्मन ने जरा तीखे होकर कहा—तुम काहे नाहीं कहत हौ? तुम्हार मुँह में जीभ नहीं है?

अमृतराय—हम समझ गये। शायद तुम लोग इनाम मॉँगने आये हो। कहारों से अब सिवाय हॉँ कहने के और कुछ न बन पड़ा। अमृतराय ने उसी दम पॉँच रुपया भगेलू के हाथ पर रख दिया। जब यह सब फिर अपनी काठरी में आये तो यों बातें करने लगे—

चम्मन—भगेलुआ बड़ा बोदा है।

रम्मन—अस रीस लागत रहा कि खाय भरे का देई।

दुक्खी—वहॉँ जाय के ठकुरासोहाती करै लागा।

भगेलू—हमासे तो उनके सामने कुछ कहै न गवा।

दुक्खी—तब काहे को यहॉँसे आगे-आगे गया रह्यो।

इतने में सुखई कहार लकडी टेकता खॉसता हुआ आ पहुँचा। और इनको जमा देखकर बोला—का भवा? सरकार का कहेन?

दुक्खी—सरकार के सामने जाय कै सब गूँगे हो गये। कोई के मुँह से बात न लिकली।

भगेलू—सुखई दादा तुम नियाव करो, जब सरकार हँसकर इनाम दे लागे तब कैसे कहा जात कि हम नौकरी छोड़न आये हैं।

सुखई—हम तो तुमसे पहले कह दीन कि यहॉँ नौकरी छोड़ी के सब जने पछतैहो। अस भलामानुष कहूँ न मिले।

भगेलू—दादा, तुम बात लाख रुपया की कहत हो।

चम्मन—एमॉँ कौन झूठ हैं। अस मनई काहॉँ मिले।

रम्मन आज दस बरस रहत भये मुदा आधी बात कबहूँ नाहीं कहेन।

भगेलू—रीस तो उनके देह में छू नहीं गै। जब बात करत है हँसकर।

मम्मन—भैया, हमसे कोऊ कहत कि तुम बीस कलदार लेव और हमारे यहॉँ चल के काम करो तो हम सराकर का छोड़ के कहूँ न जाइत। मुद्रा बिरादरी की बात ठहरी। हुक्का-पानी बन्द होई गवा तो फिर केह के द्वारे जैब।

रम्मन—यही डर तो जान मारे डालते है।

चम्मन—चौधरी कह गये हैं किआज इनकेर काम न छोड़ देहों तो टाट बाहर कर दीन जैही।

सुखई—हम एक बेर कह दीन कि पछतौहो। जस मन मे आवे करो।

कहार भगेलू के इस तरह निकल जाने पर दिल में बहुत झल्लये। चम्मन ने जरा तीखे होकर कहा—तुम काहे नाहीं कहत हौ? तुम्हार मुँह में जीभ नहीं है?

अमृतराय—हम समझ गये। शायद तुम लोग इनाम मॉँगने आये हो।

कहारों से अब सिवाय हॉँ कहने के और कुछ न बन पड़ा। अमृतराय ने उसी दम पॉँच रुपया भगेलू के हाथ पर रख दिया। जब यह सब फिर अपनी काठरी में आये तो यों बातें करने लगे—

चम्मन—भगेलुआ बड़ा बोदा है।

रम्मन—अस रीस लागत रहा कि खाय भरे का देई।

दुक्खी—वहॉँ जाय के ठकुरासोहाती करै लागा।

भगेलू—हमासे तो उनके सामने कुछ कहै न गवा।

दुक्खी—तब काहे को यहॉँसे आगे-आगे गया रह्यो।

इतने में सुखई कहार लकडी टेकता खॉसता हुआ आ पहुँचा। और इनको जमा देखकर बोला—का भवा? सरकार का कहेन?

दुक्खी—सरकार के सामने जाय कै सब गूँगे हो गये। कोई के मुँह से बात न लिकली।

भगेलू—सुखई दादा तुम नियाव करो, जब सरकार हँसकर इनाम दे लागे तब कैसे कहा जात कि हम नौकरी छोड़न आये हैं।

सुखई—हम तो तुमसे पहले कह दीन कि यहॉँ नौकरी छोड़ी के सब जने पछतैहो। अस भलामानुष कहूँ न मिले।

भगेलू—दादा, तुम बात लाख रुपया की कहत हो।

चम्मन—एमॉँ कौन झूठ हैं। अस मनई काहॉँ मिले।

रम्मन आज दस बरस रहत भये मुदा आधी बात कबहूँ नाहीं कहेन।

भगेलू—रीस तो उनके देह में छू नहीं गै। जब बात करत है हँसकर।

मम्मन—भैया, हमसे कोऊ कहत कि तुम बीस कलदार लेव और हमारे यहॉँ चल के काम करो तो हम सराकर का छोड़ के कहूँ न जाइत। मुद्रा बिरादरी की बात ठहरी। हुक्का-पानी बन्द होई गवा तो फिर केह के द्वारे जैब।

रम्मन—यही डर तो जान मारे डालते है।

चम्मन—चौधरी कह गये हैं किआज इनकेर काम न छोड़ देहों तो टाट बाहर कर दीन जैही।

सुखई—हम एक बेर कह दीन कि पछतौहो। जस मन मे आवे करो।

आठ बजे रात को जब बाबू अमृतराय सैर रिके आये तो कोई टमटम थानेवाला न था। चारों ओर घूम-घूम कर पुकारा। मगर किसी आहट न पायी। महाराज, कहार, साईस सभी चल दिये। यहाँ तक कि जो साईस उनके साथ था वह भी न जाने कहॉँ लोप हो गया। समझ गये कि दुष्टों ने छल किया। घोड़े को आप ही खोलने लगे कि सुखई कहार आता दिखाई दिया। उससे पूछा—यह सब के सब कहॉँ चले गये?

सुखई—(खॉँसकर) सब छोड़ गये। अब काम न करैगे।

अमृतराय—तुम्हें कुछ मालूम है इन सभों ने क्यों छोड़ दिया?

सुखई—मालूम काहे नाहीं, उनके बिरादरीवाले कहते हैं इनके यहॉँ काम मत करो। अमृतराय राय की समझ में पूरी बात आ गयी कि विराधियों ने अपना कोई और बस न चलते देखकर अब यह ढंग रचा है। अन्दर गये तो क्या देखते हैं कि पूर्णा बैठी खाना पका रही है। और बिल्लो इधर-उधर दौड़ रही है। नौकरों पर दॉँत पीसकर रह गये। पूर्णासे बोले—आज तुमको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा।

पूर्णा—(हँसकर) इसे आप कष्ट कहते है। यह तो मेरा सौभाग्य है।

पत्नी के अधरों पर मन्द मुसकान और ऑंखों में प्रेम देखकर बाबू साहब के चढ़े हुए तेवर बदल गये। भड़कता हुआ क्रोध ठंडा पड़ गया और जैसे नाग सूँबी बाजे का शब्द सुनकर थिरकने लगता है और मतवाला हो जाता उसी भॉँति उस घड़ी अमृतराय का चित्त भी किलोलें करने लगा। आव देखा न ताव। कोट पतलून, जूते पहने हुए रसोई में बेधड़क घुस गये। पूर्णा हॉँ,हॉँ करती रही। मगर कौन सुनता है। और उसे गले से लगाकर बोले—मै तुमको यह न करने दूगॉँ।

पूर्णा भी प्रति के नशे में बसुध होकर बोली-मैं न मानूँगी।

अमृत०—अगर हाथों में छाले पड़े तो मैं जुरमाना ले लूँगा।

पूर्णा—मैं उन छालों को फूल समझूँगी, जुरामान क्यों देने लगी।

अमृत०—और जो सिर में धमक-अमक हुई तो तुम जानना।

पूर्णा-वाह ऐसे सस्ते न छूटोगे। चन्दन रगड़ना पड़ेगा।

अमृत—चन्दन की रगड़ाई क्या मिलेगी।

पूर्णा—वाह (हंसकर) भरपेट भोजन करा दूँगी।

अमृत—कुछ और न मिलेगा?

पूर्णा—ठंडा पानी भी पी लेना।

अमृत—(रिसियाकर) कुछ और मिलना चाहिए।

पूर्णा—बस,अब कुछ न मिलेगा।

यहॉँ अभी यही बातें हो रही थीं कि बाबू प्राणनाथ और बाबू जीवननाथ आये। यह दोनों काश्मीरी थे और कालिज में शिक्षा पाते थे। अमृतराय क पक्षपातियों में ऐसा उत्साही और कोई न था जैसे यह दोनों युवक थे। बाबू साहब का अब तक जो अर्थ सिद्ध हुआ था, वह इन्हीं परोपकारियों के परिश्रम का फल था। और वे दोनों केवल ज़बानी बकवास लगानेवाली नहीं थे। वरन बाबू साहब की तरह वह दोनों भी सुधार का कुछ-कुछ कर्तव्य कर चुके थे। यही दोनों वीर थे जिन्होंने सहस्रों रुकावटों और आधाओं को हटाकर विधवाओं से ब्याह किया था। पूर्णा की सखी रामकली न अपनी मरजी से प्राणनाथ के साथ विवाह करना स्वीकार किया था। और लक्ष्मी के मॉँ-बॉँप जो आगरे के बड़े प्रतिष्ठत रईस थे, जीवननाथ से उसका विवाह करने के लिए बनारस आये थे। ये दोनों अलग-अलग मकान में रहते थे।

बाबू अमृतराय उनके आने की खबर पाते ही बाहर निकल आये और मुसकराकर पूछा—क्यों, क्या खबर है?

जीवननाथ—यह आपके यहॉँ सन्नाटा कैसा?

अमृत०—कुछ न पूछो, भाई।

जीवन०—आखिर वे दरजन-भर नौकरी कहाँ समा गये?

अमृत०—सब जहन्नुम चले गये। ज़ालिमों ने उन पर बिरादरी का दबाव डालकर यहॉँ से निकलवा दिया।

प्राणनाथ ने ठट्ठा लगाकर काह—लीजिए यहॉँ भी वह ढंग है।

अमृतराय—क्या तुम लोगों के यहॉँ भी यही हाल है।

प्राणनाथ—जनाब, इससे भी बदतर। कहारी सब छोड़ भागो। जिस कुएसे पानी आता था वहॉँ कई बदमाश लठ लिए बैठे है कि कोई पानी भरने आये तो उसकी गर्दन झाड़ें।

जीवननाथ—अजी, वह तो कहो कुशल होयी कि पहले से पुलिस का प्रबन्ध कर लिया नहीं तो इस वक्त शायद अस्पताल में होते।

अमृतराय—आखिर अब क्या किया जाए। नौकरों बिना कैसे काम चलेगा?

प्राणनाथ—मेरी तो राय है कि आप ही ठाकुर बनिए और आप ही चाकर।

ज़ीवनाथ—तुम तो मोटे-ताजे हो। कुएं से दस-बीस कलसे पानी खींच ला सकते हो।

प्राणनाथ—और कौन कहे कि आप बर्तन-भॉँडे नहीं मॉँज सकते।

अमृत-अजी अब ऐसे कंगाल भी नहीं हो गये हैं। दो नौकर अभी हैं, जब तक इनसे थोड़ा-बहुत काम लेंगे। आज इलाके पर लिख भेजता हूँ वहॉँ दो-चार नौकर आ जायँगे।

जीवन—यह तो आपने अपना इन्तिज़ाम किया। हमारा काम कैसे चले।

अमृत.—बस आज ही यहॉँ उठ आओ, चटपट।

जीवन.—यह तो ठीक नहीं। और फिर यहॉँ इतनी जगह कहॉँ है?

अमृत.—वह दिल से राज़ी हैं। कई बेर कह चुकी हैं कि अकेले जी घबराता है। यह ख़बर सुनकर फूली न समायेंगी।

जीवन—अच्छा अपने यहॉँ तो टोह लूँ।

प्राण—आप भी आदमी हैं या घनचक्कर। यहॉँ टोह लूँ वहॉँ टोह लूँ। भलमानसी चाहो तो बग्घी जोतकर ले चलों। दोनों प्राणियों को यहॉँ लाकर बैठा दो। नहीं तो जाव टोह लिया करो।

अमृत—और क्या, ठीक तो कहते हैं। रात ज्यादा जायगी तो फिर कुछ बनाये न बनेगी।

जीवन—अच्छा जैसी आपकी मरज़ी।

दोनों युवक अस्तबल में गये। घोड़ा खोला और गाड़ी जोतकर ले गये। इधर अमृतराय ने आकर पूर्णा से यह समाचार कहा। वह सुनते ही प्रसन्न हो गई और इन मेहमानों के लिए खाना बनाने लगी। बाबू साहब ने सुखई की मदद से दो कमरे साफ़ कराये। उनमें मेज, कुर्सियाँ और दूसरी जरुरत की चीज़ें रखवा दीं। कोई नौ बजे होंगे कि सवारियॉँ आ पहुँचीं। पूर्णा उनसे बड़े प्यार से गले मिली और थोड़ी ही देर में तीनों सखियॉँ बुलबुल की तरह चहकने लगीं। रामकली पहले ज़रा झेंपी। मगर पूर्णा की दो-चार बातों न उसका हियाव भी खोल दिया।

थोड़ी देर में भोजन तैयार हा गया। ओर तीनों आदमी रसोई पर गये। इधर चार-पॉँच बरस से अमृतराय दाल-भात खाना भूल गये थे। कश्मीरी बावरची तरह तरह क सालना, अनेक प्रकार के मांस खिलाया करता था और यद्यपि जल्दी में पूर्णा सिवाय सादे खानों के और कुछ न बना सकी थी, मगर सबने इसकी बड़ी प्रशंसा की। जीवननाथ और प्राणनाथ दोनों काशमीरी ही थे, मगर वह भी कहते थे कि रोटी-दाल ऐसी स्वादिष्ट हमने कभी नहीं खाई।

रात तो इस तरह कटी। दूसर दिन पूर्णा ने बिल्लो से कहा कि ज़रा बाज़ार से सौदा लाओ तो आज मेहानों को अच्छी-अच्छी चीज़े खिलाऊँ। बिल्लो ने आकर सुखई से हुक्म लगाया। और सुखई एक टोकरा लेकर बाज़ार चले। वह आज कोई तीस बरस से एक ही बनिये से सौदा करते थे। बनिया एक ही चालाक था। बुढ़ऊ को खूब दस्तूरी देता मगर सौदा रुपये में बारह आने से कभी अधिक न देता। इसी तरह इस घूरे साहु ने सब रईसों को फॉँसा रक्खा था। सुखई ने उसकी दूकान पर पहुँचते है टाकरा पटक दिया और तिपाई पर बैठकर बोला—लाव घूरे, कुछ सौदा सुलुफ तो दो मगर देरी न लगे।

और हर बेर तो घूरे हँसकर सुखई को तमाखू पिलाता और तुरन्त उसके हुक्म की तामील करने लगता। मगर आज उसने उसको और बड़ी रुखाई से देखकर कहा—आगे जाव। हमारे यहॉँ सौदा नहीं है।

सुखई—ज़रा आदमी देख के बात करो। हमें पहचानते नहीं क्या?

घूरे—आगे जाव। बहुत टें-टें न करो।

सुखई-कुछ मॉँग-वॉँग तो नहीं खा गये क्या? अरे हम सुखई हैं।

घूरे—अजी तुम लाट हो तो क्या? चलो अपना रास्ता देखो।

सुखई—क्या तुम जानते हो हमें दूसरी दुकान पर दस्तूरी न मिलेगी? अभी तुम्हरे सामने दो आने रूपया लेकर दिखा देता हूँ।

घूरे—तूम सीधे से जाओगे कि नहीं? दुकान से हटकर बात करो। बेचारा सुखई साहु की सइ रुखाई पर आर्श्चय करता हुआ दूसरी दुकान पर गया। वहॉँ भी यही जवाब मिला। तीसरी दूकान पर पहुँचा। यहॉँ भी वही धुतकार मिली। फिर तो उसने सारा-बाज़ार छान डाला। मगर कहीं सौदा न मिला। किसी ने उसे दुकान पर खड़ा तक होने न दिया। आखिर झक मारकर-सा मुँह लिये लौट आया और सब समाचार कह। मगर नमक-मसाले बिना कैसे काम चले। बिल्लो ने वहा, अब् की मैं जाती हूँ। देखूँ कैसे कोई सौदा नहीं देता। मगर वह हाते ज्यों ही बाहर निकली कि एक आदमी उसे इधर-उधर टहलता दिखायी दिया। बिल्लो को देखते ही वह उसके साथ हो लिया और जिस जिस दुकान पर बिल्लो गई वह भी परछाई की तरह साथ लगा रहा। आखिर बिल्लो भी बहुत दौड़-धूप कर हाथ झुलाते लौट आयी। बेचरी पूर्णा ने हार कर सादे पकवान बनाकर धर दिये।

बाबू अमृतराय ने जब देखा कि द्रोही लोग इसी तरह पीछे पड़े तो उसी दम लाला धनुषधारीलाल को तार दिया कि आप हमारे याहॉँ पॉँच होशियार खिदमतगार भेज दीजिए। लाला साहब पहले ही समझे हुए थे कि बनारस में दुष्ट लोग जितना ऊधम मचायें थोड़ा हैं। तार पाते ही उन्होंने अपने अपने होटल के पॉँच नौकरों को बनारस रवाना किया। जिनमें एक काश्मीरी महराज भी थी। दूसरे दिन यह सब आ पहुँचे। सब के सब पंजाबी थे, जो न तो बिरादरी के गुलाम थे और न जिनको टाट बाहर किये जाने का खटका था। विरोधियों ने उसके भी कान भरने चाहे। मगर कुछ दॉँव चला। सौदा भी लखनऊ से इतना मॉँगा लिया जो कई महीनों को काफ़ी था।

जब लोगों ने देखा इन शरारतों से अमृतराय को कुछ हानि पहुँची तो और ही चाल चले। उनके मुवक्किलों को बहकाना शुरु किया कि वह तो ईसाई हो गये हैं। साहबों के संग बैठकर खाते हैं। उनको किसी जानवर के मांस से विचार नहीं है। एक विधवा ब्रह्माणी से विवाह कर लिया है। उनका मुँह देखना, उनसे बातचीत करना भी शास्त्र के विरुद्ध है। मुवक्किलों को बहकाना शुरु कि याह कि वह तो ईसाई हो गये है। विधवा ब्रह्मणी से विवाह कर लिया है। उनका मुँह देखना, उनसे बातचीत करना भी शास्त्र के विरुद्ध है। मुवक्किलों में बहुधा करके देहातों के राजपूत ठाकुर और भुंइहार थे जो यहाता अविद्या की कालकोठरी में पड़े हुए थे या नये ज़माने क चमत्कार ने उन्हें चौंधिया दिया था। उन्होंने जब यह सब ऊटपटाँग बातें सुनी तब वे बहुत बिगड़े, बहुत झल्लाये और उसी दम कसम खाई की अब चाहे जो हो इस अधर्मी को कभी मुकदमा न देंगे। राम राम इसको वेदशास्त्र का तनिक विचार नहीं भया कि चट एक रॉँड़ को घर में बैठाल लिया। छी छी अपना लोक-परलोक दोनों बिगाड़ दिया। ऐसा ही था तो हिन्दू के घर में काहे को जन्म लिया था। किसी चोर-चंडाल के घर जनमे होते। बाप-दादे का नाम मिटा दिया। ऐसी ही बातें कोई दो सप्ताह तक उने मुवक्किलों में फैली। जिसका परिणाम यह हुआ कि बाबू अमृतराय का रंग फीका पड़ने लगा। जहॉँ मारे मुकदमों के सॉँस लेने का अवकाश न मिलता था। वहॉँ अब दिन-भर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने की नौबत आ गयी। यहॉँ तक कि तीसरा सप्ताह कोरा बीत गया और उनको एक भी अच्छा मुकदमा न मिला।

जज साहब एक बंगाली बाबू थे। अमृतराय के परिश्रम और तीव्रता, उत्साह और चपलता ने जज साहब की ऑंखों में उन्होंने बड़ी प्रशंसा दे रक्खी थी। वह अमृतराय की बढ़ती हुई वकालत को देख-देख समझ गये थे कि थोड़ी ही दिनों मे यह सब वकीलों का सभापति हा जाएगा। मगर जब तीन हफ्ते से उनकी सूरत न दिखायी दी तब उनको आश्चर्य हुआ। सरिश्तेदार से पूछा कि आजकल बाबू अमृतराय कहॉँ हैं। सरिश्तेदार साहब जाति के मुसलमान और बड़े सच्चे, साफ आदमी थे। उन्होंने सारा ब्योरा जो सुना था कह सुनाया। जज साहब सुनते ही समझ गये कि बेचारे अमृतराय सामाजिक कामों में अग्रण्य बनने का फल भोग रहे हैं। दूसरे दिन उन्होंने खुद अमृतराय को इजलास पर बुलवाया और देहाती ज़मींदारी के सामने उनसे बहुत देर तक इधर-उधर की बातें की। अमृतराय भी हँस-हँस उनकी बातों का जवाब दिया किये। इस बीच में कई वकीलों और बैरिस्टर जज साहब को दिखाने कि लिए कागज पत्र – लाये मगर साहब ने किसी के ओर ध्यान नहीं दिया। जब वह चले तो साहब ने कुसी उठकर हाथ मिलाया और जरा जोर से बोलो – बहुत अच्छा, बाबू साहब जैसा आप बोलता है, इस मुकदमे मे वैसा ही होगा।

आज जब कचहरी बरखास्त हुई तो उन जमीदारों में जिनके मुकदमे आज पेश थे, यों गलेचौर होने लगी।

ठाकुर साहब- ( पगडी बॉंधे, मूछें खडी. किये, मोटासा लद्व हाथ में लिये) आज जज साहब अमृतराय से खुब- खुब बतियात रहे।

मिश्र जी- (सिर घुटाये,टीका लगाये, मुह में तम्बाकु दाबाये और कन्घे पर अगोछा रक्खे) खूब ब बतियावत रहा मानो कोउ अपने मित्र से बतियावै।

ठाकुर- अमृतराय कस हँस- हँस मुडी हिलावत रहा।

मिश्र जी- बडे. आदमियन का सबजगह आदर होत है।

ठाकुर- जब लो दोनो बतियात रहे तब तलुक कउ वकील आये बाकी साहेब कोउ की ओर तनिक नाहीं ताकिन।

मिश्र जी- हम कहे देइत है तुमार मुकदमा उनहीं के राय से चले। सुनत रहयो कि नाहीं जब अमृतराय चले लागे तो जज साहब कहेन कि इस मुकदमे में वैसा ही होगा

ठाकुर- सुना काहे नहीं, बाकी फिर काव करी।

मिश्र जी- इतना तो हम कहित है कि अस वकिल पिरथी भर में नाहीं ना।

ठाकुर- कसबहस करत हैं मानो जिहवा पर सरस्वती बैठी होय। उनकर बराबरी करैया आज कोई नाहीं है।

मिश्र जी- मुदा इसाई होइ गया। रॉंड.से ब्याह किहेसि।

ठाकुर- एतनै तो बीच परा है। अगर उनका वकील किहे होईत तो बाजी बद के जीत जाईत।

इसी तरह दोनो में बातें हुई और दिया में बती पडतें- पडतें दोनो अमृतराय के पास गये और उनसे मुकदमें की कुल रुयदाद बयान कि। बाबू साहब ने पहले ही समझ लिया था कि इस मुकदमें में कुछ जान नहीं है। तिस पर उन्होंने मूकदमा ले लिया और दुसरे दिन एसी योग्यता से बहस की कि दूसरी ओर के वकिल- मुखतियार खडे.मुह ताकते रह गये। आख्रिर जीत का सेहरा भी उन्हीं के सिर रहा। जज साहब उनकी बकतृया पर एसे प्रसन्न हुए कि उन्होंने हँसकर घन्यबाद दिया और हाथ मिलया। बस अब क्या था । एक तो अमृतराय यों ही प्रसिद्व थे, उस पर जज साहब का यह वताव और भी सोने पर सुहागा हो गया । वह बँगले पर पहुँच कर चैन से बैठने भी न पाये थे, कि मुवक्किलो के दल के दल आने लगे और दस बजे रात तक यही ताता लगा रहा। दूसरे दिन से उनकी वकालत पहले से भी अधिक चमक उठी ।

द्रोहियों जब देखा कि हमारी चाल भी उलटी पडी. तो और भी दॉत पीसने लगे। अब मुंशी बदरीप्रसाद तो थे हि नहीं कि उन्हें सीधी चालें बताते। और न ठाकुर थे कि कुछ बाहुबल का चमत्कार दिखाते । बाबू कमलाप्रसाद अपने पिता के सामने ही से इन बातो से अलग हो गये थे। इसलिये दोहियों को अपना और कुछ बस न देख कर पंडित भगुदत का द्वार खटखटाया उनसें कर जोड कर कहा कि महाराज! कृपा-सिन्धु! अब भारत वर्ष में महा उत्पात और घोर पाप हो रहा है। अब आप ही चाहो तो उसका उद्वार हो सकता है । सिवाय आप के इस नौका को पार लगाने वाला इस संसार में कोई नहीं है। महाराज ! अगर इस समय पूरा बल न लगाया तो फिर इस नगर के वासी कहीं मुह दिखाने के योग्य नहीं रहेंगे। कृपा के परनाले और धर्म के पोखरा ने जब अपने जजमानों को ऐसी दीनता से स्तुति करते देखा तो दॉत निकालकर बोले आप लोग जौन है तैन घबरायें मत। आप देखा करें कि भृगुदत क्या करते है।

सेठ धूनीमल- महाराज! कुछ ऐसा यतन कीजिये कि इस दुष्ट का सत्यानाश् हो जाय ! कोई नाम लेवा न बचे।

कई आदमी- हॉ महाराज! इस घडी तो यही चाहिये।

भृगुदत- यही चाहिये तो यही लेना। सर्वथा नाश न कर दू तो ब्राहमण नहीं। आज के सातवें दिन उसका नाश हो जायेगा।

सेठ जी- द्वव्य जो लगे बेखटके कोठी से मॅगा लेना ।

भृगुदत- इसके कहने की कोइ आवश्यकता नहीं। केवल पॉच सौ ब्राहमण का प्रतिदिन भोजन होगा।

बाबू दीनानाथ-तो कहिये तो कोई हलवाई लगा दिया जाए। राघो हलवाई पेड़े और लडू बहुत अच्छे बनाता है।

भृगुदत- जो पूजा मैं कराउगा उसमें पेड़ा खाना वर्जित है। अधिक इमरती का सेवन हो उतना ही कार्य सिद्व हो जाता है।

इस पर पंड़ित जी के एक चेले ने कहा- गरू जी! आज तो आप ने न्याय का पाठ देते समय कहा था कि पेड़े के साथ दही मिला दिया जाए तो उसमें कोइ दोष नहीं रहता।

भृगुदत- (हॅसकर) हॉ- हॉ अब स्मरण हुआ। मनु जी ने इस शलोक में इस बात का प्रमाण दिया है।

दीनानाथ-(मुसकराकर) महाराज! चेला तो बड़ा तिब्र है।

सेठ जी- यह अपने गरूजी से बाजी ले जायेगा।

भृगुदत- अब कि इसने एक यज्ञ में दो सेर पूरियॉ खायी। उस दिन से मैने इसका नाम अंतिम परीक्षा में लिख दिया।

चेला- मैं अपने मन से थोड़ा ही उठा । अगर जजमान हाथ जोड़कर उठा न देते तो अभी सेर भर और खा के उठता।

दीनानाथ-क्यो न हो पटे ! जैसे गुरू वैसे चेला!

सेठ जी- महाराज, अब हमको आज्ञा दीजिए। आज हलवाई आ जाएगा। मुनीम जी भी उसके साथ लगे रहेगें। जो सौ दो सौ का काम लगे मुनीम जी से फरमा देना। मगर बात तब है कि आप भी इस बिषय में जान लड़ा दे।

पंड़ित जी ने सिर का कद्दू हिलाकर कहा- इसमें आप कोई खटका न समझिये। एक सप्ताह में अगर दुष्ट का न नाश हो जाए तो भृगुदत नहीं। अब आपको पूजन की बिधि भी बता ही दू। सुनिए तांत्रिक बिद्या में एक मंत्र एसा भी है जिसके जगाने से बैरी की आयु क्षीण होती है। अगर दस आदमी प्रतिदिवस उसका पाठ करे तो आयु में दोपहर की हानि होगी। अगर सौ आदमी पाठ करे तो दस दिन की हानि होगी।

यदि पाच सौ पाठ नित्य हों तो हर दिन पाच वष आयु घटती हैं।

सेठ जी- महाराज, आप ने इस घड़ी एसी बात कही कि हमारा चोला मस्त हो गया, मस्त हो गया ,

दीनानाथ- कृपासिन्घु, आप घन्य हो ! आप घन्य हो !

बहुत से आदमी- एक बार बोलो- पंड़ित भृगुदत जय !

बहुत से आदमी- एक बार बोलो- दुष्ठों की छै ! छै ! !

इस तरह कोलाहल मचाते हुए लोग अपने- अपने घरो को लौटे। उसी दिन राघो हलवाई पंड़ित जी के मकान पर जा डटा। पूजा-पाठ होने लगे । पाच सौ भुक्खड़ एकत्र हो गये और दोनों जून माल उडानें लगे। धीरे- धीरे पाच सौ से एक हजार नम्बर पहुचा पूजा-पाठ कौन करता है। सबेरे से भोजन का प्रबन्ध करते – करते दोपहर हो जाता था। और दोपहर से भंग- बूटी छानते रात हो जाती थी। हॉ पंडित भृगुदत दास का नाम पुरे शहर में उजागर हो रहा था। चारो ओर उनकी बड़ाई गाई जा रही थ। सात दिन यही अधाधुंध मचा रहा। यह सब कुछ हुआ । मगर बाबू अमृतराय का बाल बाँका न हो सका। कही चमार के सरापे डागर मिलते है। एसे ऑंख् के अंधे और गँठ के पुरे न फँसे तो भृगुदत जैसे गुगो को चखौतिया कौन करायें। सेठ जी के आदमी तिल- तिल पर अमृतराय के मकान पर दौड़ते थे कि देखें कुछ जंत्र –मत्र का फल हुआ कि नहीं। मगर सात दिन के बीतने पर कुछ फल हुआ तो यही कि अमृतराय की वकालत सदा से बढकर चमकी हुई थी।

(12)

एक स्त्री के दो पुरूष नहीं हो सकते

प्रेमा का ब्याह हुए दो महीने से अधिक बीत चुके हैं मगर अभी तक उसकी अवस्था वही है जो कुँवारापन में थी। वह हरदम उदास और मलिन रहती हैं। उसका मुख पीला पड़ गया। ऑंखें बैठे हुई, सर के बाल बिखरे, उसके दिल में अभी तक बाबू अमृतराय की मुहब्बत बनी हुई हैं। उनकी मूर्ति हरदम उसकी ऑंखों के सामने नाचा करती है। वह बहुत चाहती है कि उनकी सूरत ह्दय से निकाल दे मगर उसका कुछ बस नहीं चलता। यद्यपि बाबू दाननाथ उससे सच्चा प्रेम रखते हैं और बड़े सुन्दर हँसमुख, मिलनसार मनुष्य हैं। मगर प्रेमा का दिल उनसे नहीं मिलता। वह उनसे प्रेम-भाव दिखाने में कोई बात उठा नहीं रखती। जब वह मौजूद होते हैं तो वह हँसती भी हैं। बातचीत भी करती है। प्रेम भी जताती है। मगर जब वह चले जाते हैं तब उसके मुख पर फिर उदासी छा जाती है। उसकी सूरत फिर वियोगिन की-सी हो जाती है। अपने मैके में उसे रोने की कोई रोक-टोक न थी। जब चाहती और जब तक चाहती, रोया करती थी। मगर यहॉँ रा भी नहीं सकती। या रोती भी तो छिपकर। उसकी बूढ़ी सास उसे पान की तरह फेरा करती है। केवल इसलिए नहीं कि वह उसका पास और दबाव मानती है बल्कि इसलिए कि वह अपने साथ बहुत-सा दहेज लायी है। उसने सारी गृहस्थी पतोहू के ऊपर छोड़ रक्खी है और हरदम ईश्वर से विनय किया करती है कि पोता खेलाने के दिन जल्द आयें।

बेचारी प्रेमा की अवस्था बहुत ही शोचनीय और करुणा के योग्य है। वह हँसती है तो उसकी हँसी में रोना मिला होता है। वह बातचीत करती है तो ऐसा जान पड़ता है कि अपने दुख की कहानी कह रही है। बनाव-सिंगार से उसकी तनिक भी रुचि नहीं है। अगर कभी सास के कहने-सुनने से कुछ सजावट करती भी है तो उस पर नहीं खुलता। ऐसा मालूम होता है कि इसकी कोमल गात में जो मोहिन थी वह रुठ कर कहीं और चली गयी। वह बहुधा अपने ही कमरे में बैठी रहती है। हॉँ, कभी-कभी गाकर दिल बहलाती है। मगर उसका गाना इसलिए नहीं होता कि उससे चित्त को आनन्द प्राप्त हो। बल्कि वह मधुर स्वरों में विलाप और विषाद के राग गाया करती है।

बाबू दाननाथ इतना तो शादी करने के पहले ही जानते थे कि प्रेमा अमृतराय पर जान देती है। मगर उन्होंने समझा था कि उसकी प्रीति साधारण होगी। जब मैं उसको ब्याह कर लाऊँगा, उससे स्नहे, बढ़ाऊँगा, उस पर अपने के निछावर करुँगा तो उसके दिल से पिछली बातें मिट जायँगी और फिर हमारी बड़े आनन्द से कटेगी। इसलिए उन्होंने एक महीने के लगभग प्रेमा के उदास और मलिन रहने की कुछ परवाह न की। मगर उनको क्या मालूम था कि स्नहे का वह पौधा जो प्रेम-रस से सींच-सींच कर परवान चढ़ाया गया है महीने-दो महीने में कदापि नहीं मुरझा सकता। उन्होंने दूसरे महीने भर भी इस बात पर ध्यान न दिया। मगर जब अब भी प्रेमा के मुख से उदासी की घटा फटते न दिखायी दी तब उनको दुख होने लगा। प्रेम और ईर्ष्या का चोली-दामन का साथ है। दाननाथ सच्चा प्रेम देखते थे। मगर सच्चे प्रेम के बदले में सच्चा प्रेम चाहते भी थे। एक दिन वह मालूम से सबेर मकान पर आये और प्रेमा के कमरे में गये तो देखा कि वह सर झुकाये हुए बैठी है। इनको देखते ही उसने सर उठाया और चोट ऑंचल से ऑंसू पोंछ उठ खड़ी हुई और बोली—मुझे आज न मालूम क्यों लाला जी की याद आ गयी थी। मैं बड़ी से रो रही हूँ।

दाननाथ ने उसको देखते ही समझ लिया था कि अमृतराय के वियोग में ऑंसू बाहये जा रहे हैं। इस पर प्रेमा ने जो यों हवा बतलायी तो उनके बदन में आग लग गयी। तीखी चितवनों से देखकर बोले—तुम्हारी ऑंखें हैं और तुम्हारे ऑंसू, जितना रोया जाय रो लो। मगर मेरी ऑंखों में धूल मत झोंको।

प्रेमा इस कठोर वचन को सुनकर चौंक पड़ी और बिना कुछ उत्तर दिये पति की ओर डबडबाई हुई ऑंखों से ताकने लगी। दाननाथ ने फिर कहा—

क्या ताकती हो, प्रेमा? मैं ऐसा मूर्ख नहीं हूँ, जैसा तुम समझती हो। मैंने भी आदमी देखे हैं और मैं भी आदमी पहचानता हूँ। मैं तुम्हारी एक-एक बात की गौर से देखता हूँ मगर जितना ही देखता हूँ उतना ही चित्त को दुख होता है। क्योंकि तुम्हारा बर्ताव मेरे साथ फीका है। यद्यपि तुमको यह सुनना अच्छा न मालूम होगा मगर हार कर कहना पड़ता है कि तुमको मुझसे लेश-मात्र भी प्रेम नहीं है। मैने अब तक इस विषय में ज़बान खोलने का साहस नहीं किया था और ईश्वर जानता है कि तुमसे किस क़दर मुहब्बत करता हूँ। मगर मुहब्बत सब कुछ सह सकती है, रुखाई नहीं सह सकती और वह भी कैसी रुखाई जो किसी दूसरे पुरुष के वियोग में उत्पन्न हुई हो। ऐसा कौन बेहाय, निर्लज्ज आदमी होगा जो यह देखे कि उसकी पत्नी किसी दूसरे के लिए वियोगिन बनी हुई है और उसका लहू उबलने न लगे और उसके ह्दय में क्रोध कि ज्वाला धधक न उठे। क्या तुम नहीं जानती हो कि धर्मशास्त्र के अनुसार स्त्री अपने पति के सिवाय किसी दुसरे मनुष्य की ओर कुदृष्टि से देखने से भी पाप की भीगी हो जाती है और उसका पतिव्रत भंग हो जाता है।

प्रेमा तुम एक बहुत ऊँचे घराने की बेटी हो और जिस घराने की तुम बहू हो वह भी इस शहरमें किसी से हेठा नहीं। क्या तुम्हारे लिए यह शर्म की बात नहीं है कि तुम एक बाज़ारों की घूमनेवाली रॉँड़ ब्राह्मणीं के तुल्य भी न समझी जाओ और वह कौन है जिसने तुम्हारा ऐसा निरादर किया? वही अमृतराय, जिसके लिए तुम ओठों पहर मोती पिरोया करती हो। अगर उस दुष्ट के ह्दय में तुम्हारा कुछ भी प्रेम होता तो वह तुम्हारे पिता के बार-बार कहने पर भी तुमको इस तरह धता न बताता। कैसे खेद की बात हैं। इन्हीं ऑंखों ने उसे तुम्हारी तस्वीर को पैरो से रौंदते हुए देखा है। क्या तुमको मेरी बातों का विश्वास नहीं आता? क्या अमृतराय के कर्तव्य से नहीं विदित होता है की उनको तुम्हारी रत्ती-भर भी परवाह नहीं हैं क्या उन्होंने डंके की चोट पर नहीं साबित कर दिया कि वह तुमको तुच्छा समझते है? माना कि कोई दिन ऐसा था कि वह विवाह करने की अभिलाषा रखते थे। पर अब तो वह बात नहीं रही। अब वह अमृतराय है जिसकी बदचलनी की सारे शहर में धूम मची हुई। मगर शोक और अति शोक की बात है कि तुम उसके लिए ऑंसू बहा-बहाकर अपने मेरे खानदान के माथे कालिख का टीका लगाती हो।

दाननाथ मारे क्रोध के काँप रहे थे। चेहरा तमतमाया हुआ था। ऑंखों से चिनगारी निकल रही थी। बेचारी प्रेमा सिर नीचा किये हुए खड़ी रो रही थी। पति की एक-एक बात उसके कलेजे के पार हुई जाती थी। आखिर न रहा गया। दाननाथ के पैरों पर गिर पड़ी और उन्हें गर्म-गर्म ऑंसू की बूँदों से भिगो दिया। दाननाथ ने पैर खसका लिया। प्रेमा को चारपाई पर बैठा दिया ओर बोले—प्रेमा, रोओ मत। तुम्हारे रोने से मेरे दिल पर चोट लगती है। मैं तुमको रुलाना नहीं चाहता। परन्तु उन बातों को कहें बिना रह भी नहीं सकता। अगर यह दिल में रह गई तो नतीजा बुरा पैदा करेगी। कान खोलकर सुनो। मैं तुमको प्राण से अधिक प्यार करता हूँ। तुमको आराम पहुँचाने के लिए हाज़िर हूँ। मगर तुमको सिवाय अपने किसी दूसरे का ख्याल करते नहीं देख सकता। अब तक न जाने कैसे-कैसे मैंने दिल को समझाया। मगर अब वह मेरे बस का नहीं। अब वह यह जलन नहीं सह सकता। मैं तुमको चेताये देता हूँ कि यह रोना-धोना छोड़ा। यदि इस चेताने पर भी तुम मेरी बात न मानो तो फिर मुझे दोष मत देना। बस इतना कहे देता हूँ। कि स्त्री के दो पति कदापि जीते नहीं रह सकते।

यह कहते हुए बाबू दाननाथ क्रोध में भरे बाहर चले आये। बेचारी प्रेमा को ऐसा मालूम हुआ कि मानो किसी ने कलेजे में छुरी मार दी। उसको आज तक किसी ने भूलकर भी कड़ी बात नहीं सुनायी थी। उसकी भावज कभी-कभी ताने दिया करती थी मगर वह ऐसा न होते थे। वह घंटों रोती रही। इसके बाद उसने पति की सारी बातों पर विचार करना शुरु किया और उसके कानों में यह शब्द गूँजने लगे-एक स्त्री के दो पति कदापि जीते नहीं रह सकते।

इनका क्या मतलब है?

(13)

शोकदायक घटना

पूर्णा, रामकली और लक्ष्मी तीनों बड़े आनन्द से हित-मिलकर रहने लगी। उनका समय अब बातचीत, हँसी-दिल्लगी में कट जात। चिन्ता की परछाई भी न दिखायी देती। पूर्णा दो-तीन महीने में निखर कर ऐसी कोमलागी हो गयी थी कि पहिचान न जाती थी। रामकली भी खूब रंग-रूप निकाले थी। उसका निखार और यौवन पूर्णा को भी मात करता था। उसकी ऑंखों में अब चंचलता और मुख पर वह चपलता न थी जो पहले दिखायी देती थी। बल्कि अब वह अति सुकुमार कामिनी हो गयी थी। अच्छे संग में बैठते-बैठते उसकी चाल-ढाल में गम्भीरता और धैर्य आ गया था। अब वह गंगा स्नान और मन्दिर का नाम भी लेती। अगर कभी-कभी पूर्णा उसको छोड़ने के लिए पिछली बातें याद दिलाती तो वह नाक-भौं चढ़ा लेती, रुठ जाती। मगर इन तीनों में लक्ष्मी का रुप निराला था। वह बड़े घर में पैदा हुई थी। उसके मॉँ-बाप ने उसे बड़े लाड़-प्यार से पाला था और उसका बड़ी उत्तम रीति पर शिक्षा दी थी। उसका कोमल गत, उसकी मनोहर वाणी, उसे अपनी सखियॉँ में रानी की पदावी देती थी। वह गाने-बजाने में निपुण थी और अपनी सखियों को यह गुण सिखाया करती थी। इसी तरह पूर्णा को अनेक प्रकार के व्यंजन बनाने का व्यसन था। बेचारी रामकली के हाथों में यह सब गुण न थे। हॉँ, वह हँसोड़ी थी और अपनी रसीली बातों से सखियों को हँसाया करती थी।

एक दिन शाम को तीनों सखियाँ बैठी बातचित कर रही थी कि पूर्णा ने मुसकराकर रामकली से पूछा—क्यों रम्मन, आजकल मन्दिर पूजा करने नहीं जाती हो।

रामकली ने झेंपकर जवाब दिया—अब वहॉँ जाने को जी नहीं चाहता। लक्ष्मी रामकली का सब वृत्तान्त सुन चुकी थी। वह बोली—हॉँ बुआ, अब तो हँसने-बोलने का सामान घर ही पर ही मौजूद है।

रामकली—(तिनककर) तुमसे कौन बोलता है, जो लगी जहर उगलने। बहिन, इनको मना कर दो, यह हमारी बातों में न बोला करें। नहीं तो अभी कुछ कह बैठूँगी तो रोती फिरेंगी।

पूर्णा—मत लछिमी (लक्ष्मी) सखी को मत छोड़ो।

लक्ष्मी—(मुसकराकर) मैंने कुछ झूठ थोड़े ही कहा था जो इनको ऐसा कडुआ मालूम हुआ।

रामकली—जैसी आप है वैसी सबको समझती है।

पूर्णा— लछिमी, तुम हमारी सखी को बहुत दिक किया करती हो। तुम्हरी बाल से वह मन्दिर में जाती थी।

लक्ष्मी—जब मैं कहती हूँ तो रोती काहे को है।

पूर्णा—अब यह बात उनको अच्छी नहीं लगती तो तुम काहे को कहती हो। खबरदार, अब फिर मन्दिर का नाम मत लेना।

लक्ष्मी—अच्छा रम्मन, हमें एक बात दो तो, हम फिर तुम्हें कभी न छेड़े—महन्त जी ने मंत्र देते समय तुम्हरे कान में क्या कहा? हमारा माथा छुए जो झूठ बोले।

रामकली—(चिटक कर) सुना लछिमी, हमसे शरारत करोगी तो ठीक न होगा। मैं जितना ही तरह देती हूँ, तुम उतनी ही सर चढ़ी जाती हो।

पूर्णा—ऐ तो बतला क्यों नहीं देती, इसमें क्या हर्ज है?

रामकली—कुछ कहा होगा, तुम कौन होती हो पूछनेवाली? बड़ी आयीं वहॉँ से सीता बन के

पूर्णा—अच्छा भाई, मत बताओ, बिगड़ती काहे को हो?

लक्ष्मी—बताने की बात ही नहीं बतला कैसे दें।

रामकली—कोई बात भी हो कि यों ही बतला दूँ।

पूर्णा—अच्छा यह बात जाने दो। बताओ उस तंबोली ने तुम्हें पान खिलाते समय क्या कहा था।

रामकली—फिर छेड़खानी की सूझी। मैं भी पते की बात कह दूँगी तो लजा जाओगी।

लक्ष्मी—तुम्हे हमार कसम सखी, जरुर कहो। यह हम लोगों की बातों तो पूछ लेती है, अपनी बातें एक नहीं कहतीं।

रामकली—क्यों सखी, कहूँ? कहती हूँ, बिगड़ना मत।

पूर्णा- कहो, सॉँच को ऑंच क्या।

रामकली—उस दिन घाट पर तुमने किस छाती से लिपटा लिया था।

पूर्णा— तुम्हारा सर

लक्ष्मी— समझ गयी। बाबू अमृतराय होंगे। क्यों है न?

यह तीनों सखियॉँ इसी तरह हँस-बोल रहीं थीं कि एक बूढ़ी औरत ने आकर पूर्णा को आशीर्वाद दिया और उसके हाथ में एक खत रख दिया। पूर्णा ने अक्षर पहिचाने, प्रेमा का पत्र था। उसमें यह लिखा था—

‘‘प्यारी पूर्णा तुमसे भेंट करने को बहुत जी चाहता है। मगर यहॉँ घर से बाहर पॉँव निकालने की मजाल नहीं। इसलिए यह ख़त लिखती हूँ। मुझे तुमसे एक अति आवश्यक बात करनी है। जो पत्र में नहीं लिख सकती हूँ। अगर तुम बिल्लो को इस पत्र का जवाब देकर भेजो तो जबानी कह दूँगी। देखा देर मत करना। नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। आठ बजे के पहले बिल्लो यहॉँ अवश्य आ जाए।

तुम्हारी सखी

“प्रेमा”

पत्र पढ़ते ही पूर्णा का चित्त व्याकुल हो गया। चेहरे का रंग उड़ गया और अनेक प्रकार की शंकाएँ लगी। या नारायण अब क्या होनेवाला है। लिखती है देखो देर मत करना। नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। क्या बात है।

अभी तक वह कचहरी से नहीं लौटे। रोज तो अब तक आ जाया करते थे। इनकी यही बात तो हम को अच्छी नहीं लगती।

लक्ष्मी और रामकली ने जब उसको ऐसा व्याकुल देखा तो घबराकर बोलीं—क्या बहिन, कुशल तो है? इस पत्र में क्या लिखा है?

पूर्णा—क्या बताऊँ क्या लिखा है। रामकली, तुम जरा कमरे में जा के झॉँको तो आये या नहीं अभी।

रामकली ने आकर कहा—अभी नहीं आये।

लक्ष्मी—अभी कैसे आयेंगे? आज तो तीन आदमी व्याख्यान देने गये है।

इसी घबराहट में आठ बजा। पूर्णा ने प्रेमा के पत्र का जवाब लिखा और बिल्लो को देकर प्रेमा को घर भेज दिया। आधा घंटा भी न बीता था कि बिल्लो लौट आयी। रंग उड़ा हुआ। बदहवास और घबरायी हुई। पूर्णा ने उसे देखते ही घबराकर पूछा—कहो बिल्लो, कुशल कहो।

बिल्लो (माथा ठोंककर) क्या कहूँ, बहू कहते नहीं बनता। न जाने अभी क्या होने वाला है।

पूर्णा—क्या कहा? कुछ चिट्ठी-पत्री तो नहीं दिया?

बिल्लो—चिट्ठी कहॉँ से देती? हमको अन्दर बुलाते डरती थीं। देखते ही रोने लगी और कहा—बिल्लो, मैं क्या करुँ, मेरा जी यहॉँ बिलकुल नहीं लगता। मैं पिछली बातें याद करके रोया करती हूँ। वह (दाननाथ) कभी जब मुझे रोते देख लेते हैं तो बहुत झल्लाते हैं। एक दिन मुझे बहुत जली-कटी सुनायी और चलते-समय धमका कर कहा—एक औरत के दो चाहनेवाले कदापि जीते नहीं रह सकते। यह कहकर बिल्लो चुप हो गयी। पूर्णा के समझ में पूरी बात न आयी। उसने कहा—चुप क्यों हो गयी? जल्दी कहो, मेरा दम रुका हुआ है।

बिल्लो—इतना कहकर वह रोने लगी। फिर मुझको नजदीक बुला के कान में कहा—बिल्लो, उसी दिन से मैं उनके तेवर बदले हुए देखती हूँ। वह तीन आदमियों के साथ लेकर रोज शाम को न जाने कहॉँ जाते हैं। आज मैंने छिपकर उनकी बातचीत सुन ली। बारह बजे रात को जब अमृतराय पर चोट करने की सलाह हुई है। जब से मैंने यह सुना है, हाथों के तोते उड़े हुए हैं। मुझ अभागिनी के कारण न जाने कौन-कौन दुख उठायेगा।

बिल्लो की ज़बानी यह बातें सुनकर पूर्णा के पैर तले से मिट्टी निकल गयी। दनानाथ की तसवीर भयानक रुप धारण किये उसकी ऑंखों के सामने आकर खड़ी हो गयी।

वह उसी दम दौड़ती हुई बैठक में पहुँची। बाबु अमृतराय का वहॉँ पता न था। उसने अपना माथा ठोंक बिल्लो से कहॉँ—तुम जाकर आदमियों कह दो। फाटक पर खड़े हो जाए। और खुद उसी जगह एक कुर्सी पर बैठकर गुनने लगी कि अब उनको कैसे खबर करुँ कि इतने में गाड़ी की खड़खड़ाहट सुनायी दी। पूर्णा का दिल बड़े जोर से धड़-धड़ करने लगा। वह लपक कर दरवाज़े पर आयी और कॉँपती हुई आवाज़ से पुकार बोली—इतनी देर कहॉँ लगायी? जल्दी आते क्यों नहीं?

अमृतराय जल्दी से उतरे और कमरे के अन्दर कदम रखते ही पूर्णा ऐसे लिपट गयी मानो उन्हें किसी के वार से बचा रही है और बोली—इतनी जल्दी क्यों आये, अभी तो बहुत सवेरा है।

अमृतराय—प्यारी, क्षमा करो। आज जरा देर हो गयी।

पूर्णा—चलिए रहने दीजिए। आप तो जाकर सैर-सपाटे करते हैं। यहॉँ दूसरों की जान हलकान होती हैं

अमृतराय—क्या बतायें, आज बात ऐसी आ पड़ी कि रुकना पड़ा। आज माफ करो। फिर ऐसी देर न होगी।

यह कहकर वह कपड़े उतारने लगे। मगर पूर्णा वही खड़ी रही जैसे कोई चौंकी हुई हरिणी। उसकी ऑंखें दरवाज़े की तरफ लगी थीं। अचानक उसको किसी मनुष्य की परछाई दरवाज़े के सामने दिखायी पड़ी। और वह बिजली की राह चमककर दरवाजा रोककर खड़ी हो गयी। देखा तो कहार था। जूता खोलने आ रहा था। बाबू साहब न ध्यान से देखा तो पूर्णा कुछ घबरायी हुई दिखायी दी। बोले—प्यारी, आज तुम कुछ घबरायी हुई हो।

पूर्णा—सामनेवाला दरवाजा बन्द करा दो।

अमृतराय—गरमी हो रही हैं। हवा रुक जाएगी।

पूर्णा—यहॉँ न बैठने दूँगी। ऊपर चलो।

अमृतराय—क्यों बात क्या है? डरने की कोई वजह नहीं।

पूर्णा—मेरा जी यहॉँ नहीं लगता। ऊपर चलो। वहॉँ चॉँदनी में खूब ठंडी हवा आ रही होगी।

अमृतराय मन में बहुत सी बातें सोचते-सोचते पूर्णा के साथ कोठे पर गये। खुली हुई छत थी। कुर्सियॉँ धरी हुई थी। नौ बजे रात का समय, चैत्र के दिन, चॉँदनी खूब छिटकी हुई, मन्द-मन्द शीतल वायु चल रही थी। बगीचे के हरे-भरे वृक्ष धीरे-धीरे झूम-झूम कर अति शोभायमान हो रहे थे। जान पड़ता था कि आकाश ने ओस की पतली हलकी चादर सब चीजों पर डाल दी है। दूर-दूर के धुँधले-धुँधले पेड़ ऐसे मनोहर मालूम होते है मानो वह देवताओं के रमण करने के स्थान हैं। या वह उस तपोवन के वृक्ष हैं जिनकी छाया में शकुन्तला और उसकी सखियॉँ भ्रमण किया करती थीं और जहॉँ उस सुन्दरी ने अपने जान के अधार राजा दुष्यन्त को कमल के पत्ते पर प्रेम-पाती लिखी थी।

पूर्णा और अमृतराय कुर्सिया पर बैठ गये। ऐसे सुखदाय एकांत में चन्द्रमा की किरणों ने उनके दिलों पर आक्रमण करना शुरु किया। अमृतराय ने पूर्णा के रसीले अधर चूमकर कहा—आज कैसी सुहावनी चाँदनी है।

पूर्णा—मेरी जी इस घड़ी चाहत है कि मैं चिड़िया होती।

अमृतराय—तो क्या करतीं।

पूर्णा—तो उड़कर उन दूरवाले पेड़ों पर जा बैठती।

अमृतराय—अहा हा देखा लक्ष्मी कैसा अलाप रही है।

पूर्णा—लक्ष्मी का-सा गाना मैंने कहीं नहीं सुना। कोयला की तरह कूकती है। सुनो कौन गीत है। सुना

मोरी सुधि जनि बिसरैहो, महराज।

अमृतराय—जी चाहता है, उसे यहीं बुला लूँ।

पूर्णा- नहीं। यहॉँ गाते लजायेगी। सुनो।

इतनी विनय मैं तुमसे करत हौं

दिन-दिन स्नेह बढ़ैयो महराज।

अमृतराय—हाय जी बेचैन हुआ जाता है।

पूर्णा—जैसे कोई कलेजे में बैठा चुटकियॉँ ले रहा हो। कान लगाओ, कुछ सुना, कहती है।

मैं मधुमाती अरज करत हूँ

नित दिन पत्तिया पठैयो, महराज

अमृतराय—कोई प्रेम—रस की माती अपने सजन से कह रही है।

पूर्णा—कहती है नित दिन पत्तिया पठैयो, महराज हाय बेचारी प्रेम में डूबी हुई है।

अमृतराय—चुप हो गयी। अब वह सन्नटा कैसा मनोहर मालूम होता है।

पूर्णा—प्रेमा भी बहुत अच्छा गाती थी। मगर नहीं।

प्रेमा का नाम जबान पर आते ही पूर्णा यक़ायक चौंक पड़ी और अमृतराय के गले में हाथ डालकर बोली—क्यों प्यारे तुम उन गड़बड़ी के दिनों में हमारे घर जाते थे तो अपने साथ क्या ले जाया करते थे।

अमृतराय—(आश्चर्य से) क्यों? किसलिए पूछती हो?

पूर्णा—यों ही ध्यान आ गया।

अमृतराय—अंग्रेजी तमंचा था। उसे पिस्तौला कहते है।

पूर्णा—भला किसी आदमी के पिस्तौल की गोली लगे तो क्या हो।

अमृतराय—तुरंत मर जाए।

पूर्णा—मैं चलाना सीखूँ तो आ जाए।

अमृतराय—तुम पिस्तौल चलाना सीखकर क्या करोगी? (मुसकराकर) क्या नैनों की कटारी कुछ कम है? इस दम यही जी चाहता है कि तुमको कलेजा में रख लूँ।

पूर्णा—(हाथ जोड़कर) मेरी तुमसे यही विनय है—

मेरा सुधि जनि बिसरैहो, महाराज

यह कहते-कहते पूर्णा की ऑंखों में नीर भर आया। अमृतराय। अमृतराय भी गदगद स्वर हो गये और उसको खूब भेंच-भेंच प्यार किया, इतने में बिल्लो ने आकर कहा—चलिए रसोई तैयार है।

अमृतराय तो उधर भोजन पाने गये और पूर्णा ने इनकी अलमारी खोलकर पिस्तौल निकाल ली और उसे उलट-पुलट कर गौर से देखने लगी। जब अमृतराय अपने दोनों मित्रों के साथ भोजन पाकर लौटे और पूर्णा को पिस्तौल लिये देखा तो जीवननाथ ने मुसकराकर पूछा—क्यों भाभी, आज किसका शिकार होगा?

पूर्णा-इसे कैसे छोड़ते है, मेरे तो समझ ही में नहीं आत।

ज़ीवननाथ—लाओ मैं बता दूँ।

यह कहकर ज़ीवननाथ ने पिस्तौल हाथ में लीं। उसमें गोली भरी और बरामदे में आये और एक पेड़ के तने में निशान लगा कर दो-तीन फ़ायर किये। अब पूर्णा ने पिस्तैल हाथ में ली। गोली भरी और निशाना लगाकर दागा, मगर ठीक न पड़ा। दूसरा फ़ायर फिर किया। अब की निशाना ठीक बैठा। तीसरा फ़ायर किया। वह भी ठीक। पिस्तौल रख दी और मुसकराते हुए अन्दर चली गयी। अमृतराय ने पिस्तौल उठा लिया और जीवननाथ से बोले—कुछ समझ में नहीं आता कि आज इनको पिस्तौल की धुन क्यों सवार है।

जीवननाथ—पिस्तौल रक्ख देख के छोड़ने की जी चाहा होगा।

अमृतराय—नहीं,आज जब से मैं आया हूँ,कुछ घबरया हुआ देख रहा हूँ।

जीवननाथ—आपने कुछ पूछा नहीं।

अमृतराय—पूछा तो बहूत मगर जब कुछ बतलायें भी, हूँ-हॉँ कर के टाल गई।

जीवननाथ—किसी किताब में पिस्तौल की लड़ाई पढ़ी होगी। और क्या?

प्राणनाथ—यही मैं भी समझता हूँ।

जीवननाथ—सिवाय इसके और हों ही क्या सकता है?

कुछ देर तक तीनों आदमी बैठे गप-शप करते रहे। जब दस बजने को आये तो लोग अपने-अपने कमरों में विश्राम करने चले गये। बाबू साहब भी लेटे। दिन-भर के थके थे। अखबार पढ़ते-पढ़ते सो गये। मगर बेचारी पूर्णा की ऑंखों में नींद कहॉँ? वह बार बजे तक एक कहानी पढ़ती रही। जब तमाम सोता पड़ गया और चारो तरफ सन्नाटा छा गया तो उसे अकेले डर मालूम होने लगा। डरते ही डरते उठी और चारों तरफ के दरवाजे बन्द कर लिये। मगर जवनी की नींद, बहुत रोकने पर भी एक झपकी आ ही गयी। आधी घड़ी भी न बीती थी कि भय में सोने के कारण उसे एक अति भंयकर स्वप्न दिखायी दिया। चौंककर उठ बैठी, हाथ-पॉँव थर-थर कॉँपने लगे। दिल में धड़कन होने लगी। पति का हाथ पकड़कर चाहती थी कि जगा दें। मगर फिर यह समझकर कि इनकी प्यारी नींद उचट जाएगी तो तकलीफ होगी, उनका हाथ छोड़ दिया। अब इस समय उसकी जो अवस्था है वर्णन नहीं की जा सकती। चेहरा पीला हो रहा है, डरी हुई निगाहों से इधर-उधर ताक रही है, पत्ता भी खड़खड़ाता है ता चौंक पड़ती हैं। कभी अमृतराय के सिरहाने खड़ी होती है, कभी पैताने। लैम्प की धुंधली रोशनी में वह सन्नाटा और भी भयानक मालूम हो रहा है। तसवीरे जो दीवारों से लटक रही है, इस समय उसको घूरते हुए मालूम होती है। उसके सब रोंगटे खड़े हैं। पिस्तौल हाथ में लिये घबरा-घबरा कर घड़ी की तरफ देख रही हैं। यकायक उसको ऐसा मालूम हुआ कि कमरे की छत दबी जाती है। फिर घड़ी की सुइयों को देखा। एक बज गया था इतने ही में उसको कई आदमियों के पॉँव की आहट मालूम हुई। कलेजा बॉंसों उछालने लगा। उसने पिस्तौल सम्हाली। यह समझ गयी कि जिन लोगों के आने का खटका था वह आ गये। तब भी उसको विश्वास था कि इस बन्द कमरे में कोई न आ सकेगा। वह कान लगाये पैरों की आहट ले रही थी कि अकस्मात दरवाजे पर बड़े जोर से धक्का लगा और जब तक वह बाबू अमृतराय को जगाये कि मजबूत किवाड़ आप ही आप खुल गये और कई आदमी धड़धड़ाते हुए अन्दा घुस आये। पूर्णा ने पिस्तौल सर की। तड़ाके की आवाज हुई। कोई धम्म से गिर पड़ा, फिर कुछ खट-खट होने लगा। दो आवाजे पिस्तौल के छुटने की और हुई। फिर धमाका हुआ। इतने में बाबू अमृतराय चिल्लाये। दौड़ो-दौड़ो, चोर, चोर। इस आवाज के सुनते ही दो आदमी उनकी तरफ लपके। मगर इतने में दरवाजे पर लालटेन की रोशनी नजर आयी और प्राणानाथ और जीवननाथ हाथों में सोटे लिए आ पहुँचे। चोर भागने लगे, मगर दो के दोनों पकड़ लिए गये। जब लालटेने लेकर जमीन पर देखा तो दो लाशे दिखायी दीं। एक तो पूर्णा की लाश थी और दूसरी एक मर्द की। यकायक प्राणनाथ ने चिल्ला कर कहा—अरे यह तो बाबू दाननाथ हैं।

बाबू अमृतराय ने एक ठंडी साँस भरकर कहा—आज जब मैंने उसके हाथ में पिस्तौल देखा तभी से दिल में एक खटका-सा लगा हुआ था। मगर, हाय क्या जानता था कि ऐसी आपत्ति आनेवाली है।

प्राणनाथ—दाननाथ तो आपके मित्रों में थे।

अमृतराय—मित्रों में जब थे तब थे। अब तो शत्रु है।

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पूर्णा को दुनिया से उठे दो वर्ष बीत गया हैं। सॉँझ का समय हैं। शीतल-सुगंधित चित्त को हर्ष देनेवाली हवा चल रही हैं। सूर्य की विदा होनेवाली किरणें खिड़की से बाबू अमृतराय के सजे हुए कमेरे में जाती हैं और पूर्णा के पूरे कद की तसवीर के पैरों को चूम-चूम कर चली जाती हैं। उनकी लाली से सारा कमरा सुनहरा हो रहा हैं। रामकली और लक्ष्मी के मुखड़े इस समय मारे आनन्द के गुलाब की तरह खिले हुए है। दोनों गहने-पाते से लौस हैं और जब वह खिड़की से भर निकालती हैं और सुनहरी किरणें उनके गुलाब-से मुखड़ों पर पड़ती है तो जान पड़ता है कि सूर्य आप बलैया ले रहा है। वह रह-रहकर ऐसी चितवनों से ताकती हैं से ताकती हैं जैसी किसी की रही हैं। यकायक रामकली ने खुश होकर कहा—सुखी वह देखों आ गये। उनके कपड़े कैसे सुन्दर मालूम देते है।

एक अति सुन्दर फिटन चम-चम करती हुई फाटक के अंदर दाखिल होती है और बँगले के बरामदे में आकर रुकती है। बाबू अमृतराय उसमें से उतरते हैं। मगर अकेले नहीं। उनका एक हाथ प्रेमा के हाथ में है। यद्यपि बाबू साहब का सुन्दर चेहरा कुछ पीला हो रहा है। मगर होंठों पर हलकी-सी मुसकराहट झलक रही है और माथे पर केशर का टीका और गले में खूबसूरत हार और शोभा बढ़ा रहे हैं।

प्रेमा सुन्दरता की मूरत और जवानी की तस्वीर हो रही है। जब हमने उसको पिछली बार देखा था तो चिन्ता और दुर्बलता के चिह्न मुखड़े से पाये जाते थे। मगर कुछ और ही यौवन है। मुखड़ा कुन्दन के समान दमक रहा है। बदन गदराय हुआ है। बोटी—बोटी नाच रही है। उसकी चंचलता देखकर आश्चर्य होता है कि क्या वही पीली मुँह और उलझे बाल वाली रोगिन है। उसकी ऑंखों में इस समय एक घड़े का नशा समाया हुआ है। गुलाबी जमीन की हरे किनारेवाली साड़ी और ऊदे रंग की कलोइयों पर चुनी हुई जाकेट उस पर खिल रही है। उस पर गोरी-गारी कलाइयों में जड़ाऊ कड़े बालों में गुँथे हुए गुलाब के फूल, माथे पर लाल रोरी की गोल-बिंदी और पॉँव में जरदोज के काम के सुन्दर में सुहागा हो रहे हैं। इस ढ़ग के सिंगार से बाबू साहब को विशेष करके लगाव है क्योंकि पूर्णा देवी की तसवीर भी ऐसी ही कपड़े पहिने दिखायी देती है और उसे देखकर कोई मुश्किल से कह सकता हैं कि प्रेमा ही की सुरत आइने में उत्तर कर ऐसा यौवन नहीं दिखा रही हैं।

अमृतराय ने प्रेमा को एक मखमली कुर्सी पर बिठा दिया और मुसकरा कर बोले—प्यारी प्रेमा आज मेरी जिन्दगी का सबसे मुबारक दिन है।

प्रेमा ने पूर्णा की तसवीर की तरफ मलिन चितवनों से देखकर कहा—हमारी ज़िन्गी का क्यों नही कहते?

प्रेमा ने यह कहा था कि उसकी नजर एक लाल चीज पर जा पड़ी जो पूर्णा की तसवीर के नीचे एक खूबसूरत दीवारगीर पर धरी हुई थी। उसने लपककर उसे उठा लिया। और ऊपर का रेशमी गिलाफ हटाकर देखा तो पिस्तौल था।

बाबू अमृतराय ने गिरी हुई आवाज में कहा—यह प्यारी पूर्णा की निशानी है, इसी से उसने मेरी जान बचायी थी।

यह कहते—कहते उनकी आवाज कॉँपने लगी।

प्रेमा ने यह सुनकर उस पिस्तौला को चूम लिया और फिर बड़ी लिहाज के साथ उसी जगह पर रख दिया।

इतने में दूसरी फ़िटन दाखिल होती है। और उसमें से तीन युवक हँसते हुए उतरते हैं। तीनों का हम पहचानते है।

एक तो बाबू जीवननाथ हैं, दूसरे बाबू प्राणनाथ और तीसरे प्रेमा के भाई बाबू कमलाप्रसाद हैं।

कमलाप्रसाद को देखते ही प्रेमा कुर्सी से उठ खड़ी हुई, जल्दी से घूघँट निकाल कर सिर झुका लिया।

कमलाप्राद ने बहिन को मुसकराकर छाती से लगा लिया और बोले—मैं तुमको सच्चे दिल से मुबारकबाद देता हूँ।

दोनों युवकों ने गुल मचाकर कहा—जलसा कराइये जलसा, यों पीछा न छूटेगा।

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