भूमिका
बीसवीं शताब्दी मानव इतिहास का एक निर्णायक कालखंड है। औद्योगिक क्रांति, वैज्ञानिक आविष्कार, दो विश्व युद्ध, उपनिवेशवाद का पतन, नगरीकरण, पूँजीवाद, समाजवादी आंदोलनों और तीव्र तकनीकी विकास ने मानव जीवन की संरचना, चेतना और मूल्यबोध को गहराई से प्रभावित किया। इन्हीं व्यापक ऐतिहासिक, सामाजिक और मानसिक परिवर्तनों के गर्भ से आधुनिकतावाद (Modernism) का उदय हुआ। आधुनिकतावाद केवल एक साहित्यिक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह एक समग्र सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टिकोण है, जिसने कला, साहित्य, दर्शन, संगीत, चित्रकला और वास्तुकला—सभी क्षेत्रों में परंपरागत मान्यताओं को चुनौती दी।
आधुनिकतावाद मूलतः परंपरा-विरोधी, प्रयोगधर्मी और व्यक्ति-केंद्रित चेतना का प्रतिनिधि है। यह स्थिर मूल्यों, सुनिश्चित अर्थों और सामूहिक आदर्शों पर प्रश्नचिह्न लगाता है तथा मानव की आंतरिक विडंबनाओं, अकेलेपन, असुरक्षा और अस्तित्वगत संकट को केंद्र में रखता है।
आधुनिकतावाद की अवधारणा
‘आधुनिकतावाद’ शब्द अंग्रेज़ी के Modernism का हिंदी रूपांतर है। ‘Modern’ का अर्थ है—समकालीन, नवीन या वर्तमान। किंतु आधुनिकतावाद केवल ‘नया’ होने का नाम नहीं है, बल्कि यह पुराने मूल्य-संरचनाओं के प्रति असंतोष और नवीन जीवन-बोध की खोज का परिणाम है।
आधुनिकतावाद की प्रमुख वैचारिक विशेषता यह है कि यह—
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परंपरा को अस्वीकार या पुनर्मूल्यांकन करता है,
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सुनिश्चित अर्थों और स्थिर सत्य की धारणा को खंडित करता है,
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व्यक्ति की अनुभूति और चेतना को सर्वोपरि मानता है,
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बाह्य यथार्थ से अधिक आंतरिक यथार्थ पर बल देता है।
टी.एस. एलियट, जेम्स जॉयस, वर्जीनिया वूल्फ, एज्रा पाउंड, फ्रांज काफ्का जैसे रचनाकारों ने आधुनिकतावादी चेतना को वैश्विक साहित्य में प्रतिष्ठित किया।
आधुनिकतावाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
आधुनिकतावाद का उदय आकस्मिक नहीं है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और वैचारिक कारण हैं—
1. औद्योगिक क्रांति
औद्योगीकरण ने मानव जीवन को मशीनों, कारखानों और पूँजी के अधीन कर दिया। श्रम का यांत्रिकीकरण हुआ, जिससे मानव का आत्मिक और भावनात्मक पक्ष हाशिए पर चला गया।
2. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध
विश्व युद्धों ने मानव सभ्यता की नैतिकता और प्रगति के दावों को झूठा सिद्ध कर दिया। व्यापक विनाश, मृत्यु और विस्थापन ने मानव अस्तित्व की निरर्थकता का बोध कराया।
3. वैज्ञानिक और दार्शनिक परिवर्तन
डार्विन का विकासवाद, फ्रायड का मनोविश्लेषण और आइंस्टीन का सापेक्षता सिद्धांत—इन सभी ने सत्य, समय और मानव चेतना की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दी।
4. धार्मिक विश्वासों का क्षरण
आधुनिक युग में ईश्वर, आत्मा और परलोक जैसे विश्वास कमजोर पड़े, जिससे मनुष्य अस्तित्वगत संकट में घिर गया।
आधुनिकतावाद की प्रमुख विशेषताएँ
1. व्यक्ति-केंद्रित चेतना
आधुनिकतावाद में समाज से अधिक व्यक्ति की अनुभूति, पीड़ा और संघर्ष को महत्व दिया गया है। व्यक्ति यहाँ अकेला, असहाय और असुरक्षित दिखाई देता है।
2. परंपरा-विरोध और मूल्य-संकट
आधुनिकतावाद पारंपरिक नैतिकता, सामाजिक संस्थाओं और आदर्शों पर विश्वास नहीं करता। इसके परिणामस्वरूप, साहित्य में मूल्यहीनता और विघटन का भाव दिखाई देता है।
3. यथार्थ का आंतरिक रूप
यथार्थ अब बाह्य घटनाओं तक सीमित नहीं रहा। मन की उलझनें, स्मृतियाँ, स्वप्न, भय और अवचेतन—ये सभी आधुनिकतावादी रचना के विषय बने।
4. शिल्प और भाषा में प्रयोग
आधुनिकतावादी साहित्य में—
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कथानक का विखंडन,
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कालक्रम का भंग होना ,
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प्रतीक, बिंब और मिथकों का प्रयोग,
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चेतना-प्रवाह शैली (Stream of Consciousness)
जैसी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं।
5. अकेलापन और अलगाव
आधुनिक मनुष्य भीड़ में रहते हुए भी अकेला है। यह Alienation आधुनिकतावाद का केंद्रीय भाव है।
हिंदी साहित्य में आधुनिकतावाद
हिंदी साहित्य में आधुनिकतावाद का प्रवेश मुख्यतः छायावादोत्तर काल में हुआ। 1950 के बाद की कविता और कथा-साहित्य में आधुनिक चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
1. हिंदी कविता में आधुनिकतावाद
अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, धर्मवीर भारती जैसे कवियों ने—
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व्यक्ति की मानसिक जटिलता,
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आत्मसंघर्ष,
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सामाजिक विडंबना
को काव्य का विषय बनाया।
मुक्तिबोध की कविताएँ आधुनिकतावादी चेतना की चरम अभिव्यक्ति हैं, जहाँ आत्मसंघर्ष और सामाजिक दायित्व के बीच तनाव दिखाई देता है।
2. हिंदी कथा-साहित्य में आधुनिकतावाद
मोहन राकेश, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव आदि कथाकारों ने—
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मध्यवर्गीय जीवन की कुंठा,
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संबंधों का विघटन,
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शहरी अकेलापन
को गहराई से चित्रित किया।
आधुनिकतावाद की उपलब्धियाँ
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इसने साहित्य को आत्मचेतस और बौद्धिक बनाया
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इसमें शिल्प और भाषा में नवीन प्रयोगों को प्रोत्साहित किया गया
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यहां व्यक्ति के आंतरिक यथार्थ की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है
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इससे परंपरागत जड़ता से मुक्ति मिली
आधुनिकतावाद की सीमाएँ
उपलब्धियों के साथ-साथ हमें ‘आधुनिकतावाद’ के कुछ नकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-
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अत्यधिक जटिलता और दुरूहता
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सामाजिक यथार्थ से कटाव
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निराशा, नकारात्मकता और मूल्यहीनता
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आम पाठक से दूरी
इन सीमाओं के कारण ही आगे चलकर उत्तर-आधुनिकतावाद का उदय हुआ।
निष्कर्ष
आधुनिकतावाद एक संक्रमणकालीन चेतना है । यह परंपरा और उत्तर-आधुनिकता के बीच का सेतु है। यह मानव इतिहास के उस क्षण की अभिव्यक्ति है, जब मनुष्य ने स्वयं को असहाय, अकेला और अर्थविहीन अनुभव किया। यद्यपि इसमें निराशा और विघटन का स्वर प्रबल है, फिर भी आधुनिकतावाद ने साहित्य को आत्मविश्लेषण, बौद्धिकता और कलात्मक प्रयोगशीलता प्रदान की।
आधुनिकतावाद को समझे बिना न तो बीसवीं शताब्दी के साहित्य को समझा जा सकता है और न ही समकालीन विमर्श की जटिलताओं को। यह आंदोलन आज भी हमें प्रश्न पूछने, संदेह करने और नए अर्थों की खोज के लिए प्रेरित करता है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1➤ आधुनिकतावाद का उदय मुख्यतः किस शताब्दी में हुआ?
2➤ आधुनिकतावाद का मूल स्वभाव किससे जुड़ा है?
3➤ आधुनिकतावाद में किसे सर्वोपरि माना गया है?
4➤ आधुनिकतावाद बाह्य यथार्थ की अपेक्षा किस पर अधिक बल देता है?
5➤ औद्योगिक क्रांति का प्रमुख प्रभाव किस पर पड़ा?
6➤ आधुनिकतावाद में व्यक्ति को किस रूप में दिखाया गया है?
7➤ आधुनिकतावाद पारंपरिक मूल्यों के साथ क्या करता है?
8➤ चेतना-प्रवाह शैली किससे संबंधित है?
9➤ आधुनिकतावादी साहित्य में कथानक का स्वरूप कैसा होता है?
10➤ आधुनिकतावाद का केंद्रीय भाव कौन-सा है?
11➤ हिंदी साहित्य में आधुनिकतावाद का प्रवेश कब हुआ?
12➤ मुक्तिबोध की कविता का प्रमुख स्वर क्या है?
13➤ हिंदी कथा-साहित्य में आधुनिकतावाद का प्रमुख विषय क्या है?
14➤ आधुनिकतावाद की एक उपलब्धि क्या है?
15➤ आधुनिकतावाद की भाषा कैसी हो जाती है?
16➤ आधुनिकतावाद की एक प्रमुख सीमा क्या है?
17➤ आधुनिकतावाद में निराशा का कारण क्या है?
18➤ आधुनिकतावाद हमें किसके लिए प्रेरित करता है?










