कहानी- गुलाबसिंह

दिन और तारीख की जरूरत नहीं । जब हम अमर-अनंत की कहानी कहने चले हैं, तब एक दिन और एक ही तारीख पकड़कर क्यों चलें ?

उसके घर में पिता था, माँ थी, बहन थी । वह पूरे घर का दुलारा था ।

एक दिन की बात है, वह बीमार पड़ा । माँ ने उसका खाना बिलकुल रोक दिया था । पर उसका बार-बार कुछ खाने को माँगना छोटी-सी बहन से न सहा गया । बहन का जी न माना । वह चुपके से गुड़ और चने चुरा लाई, और भैया को खिलाने चली । यह बात और है कि उसके बाद भैया का बुखार चढ़ा । इसके लिए यह मां-बाप का गुस्सा सहने को तैयार थी । पर भाई ने भी वह गुड़-चने की बात किसी, को न बताई, और बहन बताती ही क्यों ? खैर…किसी तरह रोग बढ़ते-बढ़ते खतम हो गया । रोग गया और बहन की प्रेम की वह बात सदा के लिए भाई के मन पर छप गई ।

ऐसी एक नहीं अनेक बातें, बहन की, माँ की, पिता की उसके मन पर छपी थीं । वह कभी उनसे लड़ता-झगड़ता भी, पर आँखों के आंसू और मन के रंग उसके अंतस् पर छपी तस्वीरों को न धो सके, न धुंधला सके ।

एक दिन ऐसी हवा बही, कि मुरझाए हुए मनों में भी नई जान आ गई । एक हवा ऐसी होती है जो मुरझाए हुए पौधों में ताजगी ला देती है, और एक हवा ऐसी होती है जो मुर्दा मन मनुष्यों में नई उमंग भर देती है । यह उमंगों वाली हवा थी । बड़ा, मारी जुलूस निकला, कौमी झंडे का जुलूस था वह । पर बादशाह का हुकुम था कि जुलूस न निकले, झंडा न निकले ? शहर में आतंक छा गया । बड़ा जालिम था वह बादशाह !

‘बड़ा आया बादशाह ! क्यों न निकले जुलूस? क्यों न निकले झंडा ?’ भाई से बहन ने कहा ।

बहन क्या कहती है, उसने सुन लिया । बहन फिर बोली, ‘कौन है यह बादशाह ?’

भैया ने कहा, ‘उँह होगा कोई !’

बहन ने फिर पूछा, ‘क्यों न निकले जुलूस ? क्यों न निकले झंडा?’

भाई कटु स्वर में बोला, ‘हमारा देश बादशाह का गुलाम जो है ।’

बहन का उत्तर था, ‘तब तो जरूर निकले जुलूस ! हम जरूर फहराएंगे अपना झंडा ! देखते हैं कौन रोकता है हमें!’

झंडे की तैयारी होने लगी । बहन ने अपनी पुरानी ओढ़नी फाड़कर झंडा बना लिया । लाल- हरा रंग भी चढ़ गया । भाई ने उसे अपने खेलने के डंडे से बाँध लिया । झंडा तैयार था । अब भाई झंडा लेकर चला । बहन आग्रह से बोली, ‘अरे भाई ! जाते कहां हो ? हम भी साथ चलेंगे ।’

‘पर बहन, बड़ी दूर जाना है । तुम थक जाओगी ।’

‘नहीं भैया !’

‘नहीं बहन !’

‘जुलूस कौन बनाएगा ? तुम झंडा उठाना, हम जुलूस बनाकर पीछे चलेंगे ।’

‘नहीं रानी, तुम जुलूस नहीं… तुम एक काम करो । हमें रोली का तिलक लगाकर विदा करो जैसे राजकुमारी अपने भाई राजकुमार को विदा करती है ।’

बहन ने खुशी की किलकारी के साथ ताली बजाई और दौड़कर, थोड़ी-सी रोली, थोड़े-से चावल सजा लाई । थाली में एक दीया भी जल रहा था। भाई की आरती उतारनी थी । मुंह के चारों तरफ़ घूमती थाली एक आभामंडल बनाने लगी । उसने देवी…देवताओं के चित्रों में भी वैसा ही आभामंडल देखा था। भाई के चारों तरफ़ वैसा ही आभामंडल देखकर वह बहुत खुश हूई ।

बहन ने भाई के माथे पर तिलक लगाया, चावल बिखराए। तब भाई ने बहन के पैर छुए और विदा ली । बहन ने भाई के सिर पर हाथ फेरा और बलैयाँ लीं ।

अब वह झंडा लेकर चला ।

बहन दरवाजे पर खड़ी देखती रह गई । कहानियों की राजकुमारियां इसी तरह विदा करती थीं और देखती खड़ी रह जाती थीं ।

दूर तक भाई के लहराते हुए झंडे को जाते हुए देखती रही वह ।

बहुत दूर जाने पर बादशाह के सिपाहियों ने झंडे वाले को रोका । वह न रुका, नहीं रुका और बादशाह के सिपाहियों ने गोली चला दी । वह गिरा । झंडा उसके हाथ में था ।

गोलियां चल जाने पर किसकी हिम्मत कि सड़क, पर जाता और घायल को संभालता ? पर बहन ने उसको गिरते देख लिया था । न जाने क्यों उसका दिल पहले से ही कुछ धक-धक कर रहा था । वह दौड़ पड़ी, अकेली दौड़ती जा पहुंची, भाई खून से लथपथ पड़ा था । पुकारा-‘भैया!’

भाई के प्राण मानो यह अमृतवाणी सुनकर लौट पड़े । बोला, तू आई, यह झंडा ले ।

बहन ने झंडा ले लिया । पर भाई चला गया । बहन रोई पर झंडा हाथ में लिए रही । बादशाह के सिपाही मानो गढ़ जीतकर चले गए थे । अब बहुत से लोग आए । अरथी उठी । सामने भाई की बहन वही झंडा लिए चल रही थी ।

बादशाह का हुकुम था कि जुलूस नहीं निकलेगा, कौमी झंडा नहीं निकलेगा, पर जुलूस निकला, झंडा भी निकला ।

यह कहानी कहाँ की है ? किसकी है ? हम क्या बतावें ! यह फ्रांस की राज्य-क्रांति की हो सकती है । यह रूस की राज्य-क्रांति की हो सकती है । यह हिन्दुस्तान की सन् 42 की क्रांति की भी हो सकती है, क्योंकि यह घटना चिरंतन है, अनंत है । यह जैसे पेरिस में मास्को में, वैसे जबलपुर में हो सकती है ।

जबलपुर में ? तो क्या उस वीर बालक का नाम गुलाबसिंह हो सकता है ?

 
(यह कहानी ‘सीधे-साधे चित्र’ कहानी संग्रह में संकलित है। जिसका प्रकाशन सन् 1947 में हुआ था। यह सुभद्राकुमारी चौहान का तीसरा और अंतिम कहानी संग्रह है।)

 

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