अजातशत्रु

 द्वितीय अंक 

प्रथम दृश्य

स्थान – मगध

अजातशत्रु की राजसभा।

अजातशत्रु : यह क्या सच है, समुद्र! मैं यह क्या सुन रहा हूँ! प्रजा भी ऐसा कहने का साहस कर सकती है? चींटी भी पंख लगाकर बाज के साथ उड़ना चाहती है! ‘राज-कर मैं न दूँगा’-यह बात जिस जिह्वा से निकली, बात के साथ ही वह भी क्यों न निकाल ली गई? काशी का दण्डनायक कौन मूर्ख है? तुमने उसी समय उसे बन्दी क्यों नहीं किया?

समुद्रदत्त : देव! मेरा कोई अपराध नहीं। काशी में बड़ा उपद्रव मचा था। शैलेन्द्र नामक विकट डाकू के आतंक से लोग पीड़ित थे। दण्डनायक ने मुझसे कहा कि काशी के नागरिक कहते हैं कि हम कोसल की प्रजा हैं, और…

अजातशत्रु : कहो-कहो, रुकते क्यों हो?

समुद्रदत्त : और हम लोग उस अत्याचारी राजा को कर न देंगे जो धर्म के बल से पिता के जीते-जी सिंहासन छीनकर बैठ गया है। और, जो पीड़ित प्रजा की रक्षा भी नहीं कर सकता-उनके दुःखों को नहीं सुनता तथा…

अजातशत्रु : हाँ-हाँ, कहो, संकोच न करो।

समुद्रदत्त : सम्राट्! इसी तरह की बहुत-सी बातें वे कहते हैं, उन्हें सुनने में कोई लाभ नहीं। अब जो आज्ञा दीजिए वह किया जाए।

अजातशत्रु : ओह! अब समझ में आया। यह काशी की प्रजा का कण्ठ नहीं, इसमें हमारी विमाता का व्यंग्य-स्वर है। इसका प्रतिकार आवश्यक है। इस प्रकार अजातशत्रु को कोई अपदस्थ नहीं कर सकता।

कुछ सोचता है।

दौवारिक : ( प्रवेश करके ) जय हो, आर्य देवदत्त आ रहे हैं।

देवदत्त का प्रवेश।

देवदत्त : सम्राट् का कल्याण हो, धर्म की वृद्धि हो, शासन सुखद हो!

अजातशत्रु : नमस्कार, भगवन्! आपकी कृपा से सब कुछ होगा और यह उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आवश्यकता के समय आप पुकारे हुए देवता की तरह आ जाते हैं।

देवदत्त : ( बैठता हुआ ) आवश्यकता कैसी राजन्! आपको कमी क्या है, और हम लोगों के पास आशीर्वाद के अतिरिक्त और धरा ही क्या है? फिर भी सुनूँ…

अजातशत्रु : कोसल के दाँत जम रहे हैं। वह काशी की प्रजा में विद्रोह करना चाहता है। वहाँ के लोग राजस्व देना अस्वीकार करते हैं।

देवदत्त : पाखण्डी गौतम आजकल उसी ओर घूम रहा है, इसीलिए। कोई चिन्ता नहीं। गौतम की कोई चाल नहीं चलेगी। यदि मुनिव्रत धारण करके भी वह ऐसे साम्राज्य के षड्यन्त्रों में लिप्त है, तो मैं भी हठवश उसका प्रतिद्वन्द्वी बनूँगा। परिषद् का आह्वान करो।

अजातशत्रु : जैसी आज्ञा-( दौवारिक से )- जाओ जी, परिषद् के सभ्यों को बुला लाओ।

दौवारिक जाता है, फिर प्रवेश।

दौवारिक : सम्राट् की जय हो! कोसल से कोई गुप्त अनुचर आया है और दर्शन की इच्छा प्रकट करता है।

देवदत्त : उसे लिवा लाओ।

दौवारिक जाकर लिवा लाता है।

दूत : मगध-सम्राट् की जय हो! कुमार विरुद्धक ने यह पत्र श्रीमान् की सेवा में भेजा है।

पत्र देता है , अजातशत्रु पत्र पढ़कर देवदत्त को दे देता है।

देवदत्त : ( पढ़कर ) वाह, कैसा सुयोग! हम लोग क्यों न सहमत होंगे। दूत, तुम्हें शीघ्र पुरस्कार और पत्र मिलेगा- जाओ, विश्राम करो।

दूत जाता है।

अजातशत्रु : गुरुदेव, बड़ी अनुकूल घटना है! मगध जैसा परिवर्तन कर चुका है, वही तो कोसल भी चाहता है। हम नहीं समझते कि बुड्ढों को क्या पड़ी है और उन्हें सिंहासन का कितना लोभ है। क्या यह पुरानी और नियन्त्रण में बँधी हुई, संसार के कीचड़ में निमज्जित राजतन्त्र की पद्धति नवीन उद्योग को असफल कर देगी? तिलभर भी जो अपने पुराने विचारों से हटना नहीं चाहता, उसे अवश्य नष्ट हो जाना चाहिए, क्योंकि यह जगत् ही गतिशील है।

देवदत्त : अधिकार, चाहे वे कैसे भी जर्जर और हल्की नींव के हों, अथवा अन्याय ही से क्यों न संगठित हों, सहज में नहीं छोड़े जा सकते। भद्रजन उन्हें विचार से काम में लाते हैं और हठी तथा दुराग्रही उनमें तब तक परिवर्तन भी नहीं करना चाहते, जब तक वे एक बार ही न हटा दिए जाएँ।

दौवारिक : ( प्रवेश करके ) जय हो, देव! महामान्य परिषद् के सभ्यगण आए हैं।

देवदत्त : उन्हें लिवा लाओ!

दौवारिक जाकर लिवा लाता है।

परिषद्गण : सम्राट् की जय हो! ( महात्मा को अभिवादन करते हैं। )

देवदत्त: राष्ट्र का कल्याण हो। राजा और परिषद् की श्री-वृद्धि हो।

सब बैठते हैं।

परिषद्गण : क्या आज्ञा है?

अजातशत्रु : आप लोग राष्ट्र के शुभचिन्तक हैं। जब पिताजी ने यह प्रकाण्ड बोझ मेरे सिर पर रख दिया और मैंने इसे ग्रहण किया, तब इसे भी मैंने किशोर जीवन का एक कौतुक ही समझा था। किन्तु बात वैसी नहीं थी! मान्य महोदयो, राष्ट्र में एक ऐसी गुप्त शक्ति का कार्य खुले हाथों चल रहा है, जो इस शक्तिशाली मगध-राष्ट्र को उन्नत नहीं देखना चाहती। और मैंने केवल इस बोझ को आप लोगों की शुभेच्छा का सहारा पाकर लिया था। आप लोग बताइए कि उस शक्ति का दमन आप लोगों को अभीष्ट है कि नहीं? या अपने राष्ट्र और सम्राट् को आप लोग अपमानित करना चाहते हैं?

परिषद्गण : कभी नहीं। मगध का राष्ट्र सदैव गर्व से उन्नत रहेगा और विरोधी शक्ति पद-दलित होगी।

देवदत्त : कुछ मैं भी कहना चाहता हूँ। इस समय जब मगध का राष्ट्र अपने यौवन में पैर रख रहा है, तब विद्रोह की आवश्यकता नहीं, राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक को उसकी उन्नति सोचनी चाहिए। राजकुल के कौटुम्बिक झगड़ों से और राष्ट्र से कोई ऐसा सम्बन्ध नहीं कि उनके पक्षपाती होकर हम अपने देश की और जाति की दुर्दशा कराएँ। सम्राट् की विमाता बार-बार विप्लव की सूचना दे रही हैं। यद्यपि महामान्य सम्राट् बिम्बिसार ने अपने सब अधिकार अपनी सुयोग्य सन्तान को दे दिए हैं, फिर भी ऐसी दुश्चेष्टा क्यों की जा रही है काशी, जो कि बहुत दिनों से मगध का एक सम्पन्न प्रान्त रहा है, वासवी देवी के षड्यन्त्र से राजस्व देना अस्वीकार करता है। वह कहता है कि मैं कोसल का दिया हुआ वासवी देवी का रक्षित धन हूँ। क्या ऐसे सुरम्भ और धनी प्रदेश को मगध छोड़ देने को प्रस्तुत है? क्या फिर इसी तरह और प्रदेश भी स्वतन्त्र होने की चेष्टा न करेंगे? क्या इसी में राष्ट्र का कल्याण है?

सब : कभी नहीं, कभी नहीं। ऐसा कदापि न होने पाएगा।

अजातशत्रु : तब आप लोग मेरा साथ देने के लिए पूर्ण रूप से प्रस्तुत हैं? देश को अपमान से बचाना चाहते हैं?

सब : अवश्य! राष्ट्र के कल्याण के लिए प्राण तक विसर्जन किया जा सकता है, और हम सब ऐसी प्रतिज्ञा करते हैं।

देवदत्त : तथास्तु! क्या इसके लिए कोई नीति आप लोग निर्धारित करेंगे?

एक सभ्य : मेरी विनीत सम्मति है कि आप ही इस परिषद् के प्रधान बनें और नवीन सम्राट् को अपनी स्वतन्त्र सम्मति देकर राष्ट्र का कल्याण करें, क्योंकि आप सदृश महात्मा सर्वलोक के हित की कामना रखते हैं। राष्ट्र का उद्धार करना भी भारी परोपकरार है।

अजातशत्रु : यह मुझे भी स्वीकार है।

देवदत्त : मेरी सम्मति है कि साम्राज्य का सैनिक अधिकार स्वयं लेकर सेनापति के रूप में कोसल के साथ युद्ध और उसका दमन करने के लिए अजातशत्रु को अग्रसर होना चाहिए। समुद्रदत्त गुप्त-प्रणिधि बनकर काशी जाएँ और प्रजा को मगध के अनुकूल बनाएँ, तथा शासन-भार परिषद् अपने सिर पर लें।

दूसरा सभ्य : यदि सम्राट् बिम्बिसार इसमें अपमान समझें?

देवदत्त : जिसने राज्य अपने हाथ से छोड़कर स्त्री की वश्यता स्वीकार कर ली, उसे इसका ध्यान भी नहीं हो सकता। फिर भी उनके समस्त व्यवहार वासवी देवी की अनुमति से होंगे। ( सोचकर ) और भी एक बात है, मैं भूल गया था, वह यह कि कार्य को उत्तम रूप से चलाने के लिए महादेवी छलना परिषद् की देख-रेख किया करें।

समुद्रदत्त : यदि आज्ञा हो, तो मैं भी कुछ कहूँ।

परिषद्गण : हाँ-हाँ, अवश्य।

समुद्रदत्त : यह एक भी सफल नहीं होगा, जब तक वासवी देवी के हाथ-पैर चलते रहेंगे। यदि आप लोग राष्ट्र का निश्चित कल्याण चाहते हैं, तो पहले इसका प्रबन्ध करें।

देवदत्त : तुम्हारा तात्पर्य क्या है?

समुद्रदत्त : यही कि वासवी देवी को महाराज बिम्बिसार से अलग तो किया नहीं जा सकता-फिर भी आवश्यकता से बाध्य होकर उस उपवन की रक्षा पूर्ण रूप से होनी चाहिए।

तीसरा सभ्य : क्या महाराज बन्दी बनाए जाएँगे? मैं ऐसी मंत्रणा का विरोध करता हूँ। यह अनर्थ है! अन्याय है!

देवदत्त : ठहरिए, अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण कीजिए और विषय के गौरव को मत भुला दीजिए। समुद्रदत्त सम्राट् बिम्बिसार को बन्दी नहीं बनाना चाहता, किन्तु नियन्त्रण चाहता है, सो भी किस पर, केवल वासवी देवी पर, जो कि मगध की गुप्त शत्रु है। इसका और कोई दूसरा सरल उपाय नहीं। यह किसी पर प्रकट करके सम्राट् का निरादर न किया जाए, किन्तु युद्धकाल की राज-मर्यादा कहकर अपना काम निकाला जाए, क्योंकि ऐसे समय में राजकुल की विशेष रक्षा होनी चाहिए।

तीसरा सभ्य : तब मेरा कोई विरोध नहीं।

अजातशत्रु : फिर, आप लोग आज की इस मन्त्रणा से सहमत हैं?

सब : हम सबको स्वीकार है।

अजातशत्रु : तथास्तु!

सब जाते हैं।

( पट – परिवर्तन )

 द्वितीय दृश्य

स्थान – पथ।

मार्ग में बन्धुल।

बन्धुल : ( स्वगत ) इस अभिमानी राजकुमार से तो मिलने की इच्छा भी नहीं थी, किन्तु क्या करूँ, उसे अस्वीकार भी नहीं कर सका। कोसल-नरेश ने जो मुझे काशी का सामन्त बनाया है, वह मुझे अच्छा नहीं लगता, किन्तु राजा की आज्ञा। मुझे तो सरल और सैनिक-जीवन ही रुचिकर है। यह सामन्त का आडम्बरपूर्ण पद कपटाचरण की सूचना देता है। महाराज प्रसेनजित् ने कहा कि ‘शीघ्र ही मगध काशी पर अधिकार करना चाहेगा, इसलिए तुम्हारा वहाँ जाना आवश्यक है।’ यहाँ का दण्डनायक तो मुझसे प्रसन्न है। अच्छा, देखा जाएगा। ( टहलता है ) यह समझ में नहीं आता कि एकान्त में कुमार क्यों मुझसे मिलना चाहता है!

विरुद्धक का प्रवेश।

विरुद्धक : सेनापते! कुशल तो है

बन्धुल : कुमार की जय हो! क्या आज्ञा है? आप क्यों अकेले हैं?

विरुद्धक : मित्र बन्धुल! मैं तो तिरस्कृत राज-सन्तान हूँ। फिर अपमान सहकर, चाहे वह पिता का सिंहासन क्यों न हो, मुझे रुचिकर नहीं।

बन्धुल : राजकुमार! आपको सम्राट् ने निर्वासित तो नहीं किया, फिर आप क्यों इस तरह अकेले घूमते हैं? चलिए-काशी का सिंहासन आपको मैं दिला सकता हूँ।

विरुद्धक : नहीं बन्धुल! मैं दया से दिया हुआ दान नहीं चाहता, मुझे तो अधिकार चाहिए, स्वत्व चाहिए।

बन्धुल : फिर आप क्या करेंगे?

विरुद्धक : जो कर रहा हूँ।

बन्धुक : वह क्या?

विरुद्धक : मैं बाहुबल से उपार्जन करूँगा। मृगया करूँगा। क्षत्रियकुमार हूँ, चिन्ता क्या है स्पष्ट कहता हूँ बन्धुल, मैं साहसिक हो गया हूँ। अब वही मेरी वृत्ति है। राज्य-स्थापन करने के पहले मगध के भूपाल भी तो यही करते थे!

बन्धुल : सावधान! राजकुमार! ऐसी दुराचार की बात न सोचिए। यदि आप इस पथ से नहीं लौटते, तब मेरा भी कुछ कर्त्तव्य होगा, जो आपके लिए बड़ा कठोर होगा। आतंक का दमन करना प्रत्येक राजपुरुष का कर्म है, यह युवराज को भी मानना ही पड़ेगा।

विरुद्धक : मित्र बन्धुल! तुम बड़े सरल हो। जब तुम्हारी सीमा के भीतर कोई उपद्रव हो, तो मुझे इसी तरह आह्वान कर सकते हो किन्तु इस समय तो मैं एक दूसरी-तुम्हारे शुभ की बात कहने आया हूँ। कुछ समझते हो कि तुमको काशी का सामन्त क्यों बनाकर भेजा गया है?

बन्धुल : यह तो बड़ी सीधी बात है-कोसल-नरेश इस राज्य को हस्तगत करना चाहते हैं, मगध भी उत्तेजित है, युद्ध की सम्भावना है; इसलिए मैं यहाँ भेजा गया हूँ। मेरी वीरता पर कोसल को विश्वास है।

विरुद्धक : क्या ही अच्छा होता कि कोसल तुम्हारी बुद्धि पर भी अभिमान कर सकता, किन्तु बात कुछ दूसरी ही है।

बन्धुल : वह क्या?

विरुद्धक : कोसल-नरेश को तुम्हारी वीरता से सन्तोष नहीं; किन्तु आतंक है। राजशक्ति किसी को भी इतना उन्नत नहीं देखना चाहती।

बन्धुल : फिर सामन्त बनाकर मेरा क्यों सम्मान किया गया?

विरुद्धक : यह एक षड्यन्त्र है-जिससे तुम्हारा अस्तित्व न रह जाए।

बन्धुल : विद्रोही राजकुमार! मैं तुम्हें बन्दी बनाता हूँ। सावधान हो!

पकड़ना चाहता है।

विरुद्धक : अपनी चिन्ता करो; मैं ‘शैलेन्द्र’ हूँ।

विरुद्धक तलवार खींचता हुआ निकल जाता है, फिर बन्धुल भी चकित होकर चला जाता है।

श्यामा का प्रवेश।

श्यामा : ( स्वगत ) रात्रि चाहे कितनी भयानक हो, किन्तु प्रेममयी रमणी के हृदय से भयानक वह कदापि नहीं हो सकती। यह देखो, पवन मानो किसी डर से धीरे-धीरे साँस ले रहा है। किसी आतंक से पक्षीवृन्द अपने घोंसलों में जाकर छिप गए हैं। आकाश में ताराओं का झुंड नीरव-सा है, जैसे कोई भयानक बात देखकर भी वे बोल नहीं सकते, केवल आपस में इंगित कर रहे हैं! संसार किसी भयानक समस्या में निमग्न-सा प्रतीत होता है! किन्तु मैं शैलेन्द्र से मिलने आई हूँ-वह डाकू है तो क्या, मेरी भी अतृप्त वासना है। मागन्धी! चुप, वह नाम क्यों लेती है। मागन्धी कौशाम्बी के महल में आग लगाकर जल मरी-अब तो मैं श्यामा, काशी की प्रसिद्ध वार-विलासिनी हूँ। बड़े-बड़े राजपुरुष और श्रेष्ठि इसी चरण को छूकर अपने को धन्य समझते हैं। धन की कमी नहीं, मान का कुछ ठिकाना नहीं; राजरानी होकर और क्या मिलता था, केवल सापत्न्य ज्वाला की पीड़ा!

विरुद्धक का प्रवेश।

विरुद्धक : रमणी! तुम क्यों इस घोर कानन में आई हो?

श्यामा : शैलन्द्र, क्या तुम्हीं को बताना होगा! मेरे हृदय में जो ज्वाला उठ रही है, उसे अब तुम्हारे अतिरिक्त कौन बुझाएगा? तुम मेरे स्नेह की परीक्षा चाहते थे-बोलो, तुम कैसी परीक्षा चाहते हो?

विरुद्धक : श्यामा, मैं डाकू हूँ। यदि तुमको इसी समय मार डालूँ?

श्यामा : तुम्हारे डाकूपन का ही विश्वास करके आई हूँ। यदि साधारण मनुष्य समझती-जो ऊपर से बहुत सीधा-सादा बनता है-तो मैं कदापि यहाँ आने का साहस न करती। शैलेन्द्र! लो, यह अपनी नुकीली कटार, इस तड़पते हुए कलेजे में भोंक दो!

घुटने के बल बैठ जाती है।

विरुद्धक : किन्तु श्यामा! विश्वास करने वाले के साथ डाकू भी ऐसा नहीं करते, उनका भी एक सिद्धान्त होता है। तुमसे मिलने में इसलिए मैं डरता था कि तुम रमणी हो और वह भी वारविलासिनी; मेरा विश्वास है कि ऐसी रमणियाँ डाकुओं से भी भयानक हैं।

श्यामा : तो क्या अभी तक तुम्हें मेरा विश्वास नहीं? क्या तुम मनुष्य नहीं हो, आन्तरिक प्रेम की शीतलता ने तुम्हें कभी स्पर्श नहीं किया? क्या मेरी प्रणय भिक्षा असफल होगी? जीवन की कृत्रिमता में दिन-रात प्रेम का बनिज करते-करते क्या प्राकृतिक स्नेह का स्रोत एक बार ही सूख जाता है? क्या वार-विलासिनी प्रेम करना नहीं जानती? क्या कठोर और क्रूर कर्म करते-करते तुम्हारे हृदय में चेतनालोक की गुदगुदी और कोमल स्पन्दन नाम को भी अवशिष्ट नहीं है? क्या तुम्हारा हृदय केवल मांसपिंड है? उसमें रक्त का संचार नहीं? नहीं-नहीं, ऐसा नहीं प्रियतम! ( हाथ पकड़कर गाती है। )

बहुत छिपाया, उफन पड़ा अब,

सँभालने का समय नहीं है

अखिल विश्व में सतेज फैला

अनल हुआ यह प्रणय नहीं है

कहीं तड़पकर गिरे न बिजली

कहीं न वर्षा हो कालिमा की

तुम्हें न पाकर शशांक मेरे

बना शून्य यह, हृदय नहीं है

तड़प रही है कहीं कोकिला

कहीं पपीहा पुकारता है

यही विरुद क्या तुम्हें सुहाता

कि नील नीरद सदय नहीं है

जली दीपमालिका प्राण की

हृदय-कुटी स्वच्छ हो गई है

पलक-पाँवड़े बिछा चुकी हूँ

न दूसरा ठौर, भय नहीं है

चपल निकलकर कहाँ चले अब

इसे कुचल दो मृदुल चरण से

कि आह निकले दबे हृदय से

भला कहो, यह विजय नहीं है

दोनों हाथ – में – हाथ मिलाए हुए जाते हैं।

( पट – परिवर्तन )

 तृतीय दृश्य

स्थान – मल्लिका का उपवन।

मल्लिका और महामाया।

मल्लिका : वीर-हृदय युद्ध का नाम ही सुनकर नाच उठता है। शक्तिशाली भुज-दण्ड फड़कने लगते हैं। भला मेरे रोकने से वे रुक सकते थे! कठोर कर्मपथ में अपने स्वामी के पैर का कण्टक भी मैं नहीं होना चाहती। वह मेरे अनुराग, सुहाग की वस्तु हैं। फिर भी उनका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है, जो हमारी शृंगार-मंजूषा में बन्द करके नहीं रखा जा सकता। महान् हृदय को केवल विलास की मदिरा पिलाकर मोह लेना ही कर्त्तव्य नहीं है।

महामाया : मल्लिका, तेरा कहना ठीक है, किन्तु फिर भी…

मल्लिका : किन्तु-परन्तु नहीं। वे तलवार की धार हैं, अग्नि की भयानक ज्वाला हैं, और वीरता के वरेण्य दूत हैं। मुझे विश्वास है कि सम्मुख युद्ध में चक्र भी उनके प्रचण्ड आघातों को रोकने में असमर्थ है। रानी! एक दिन मैंने कहा कि ‘मैं पावा के अमृतसर का जल पीकर स्वस्थ होना चाहती हूँ; पर वह सरोवर पाँच सौ प्रधान मल्लों से सदैव रक्षित रहता है। दूसरी जाति का कोई भी उसमें जल नहीं पीने पाता।’ उसी दिन स्वामी ने कहा कि ‘तभी तो तुम्हें वह जल अच्छी तरह पिला सकूँगा।’

महामाया : फिर क्या हुआ?

मल्लिका : रथ पर अकेले मुझे लेकर वहीं चले। उस दिन मेरा परम सौभाग्य था, सारी मल्लजाति की स्त्रियाँ मुझ पर ईर्ष्या करती थीं। जब मैं अकेली रथ पर बैठी थी, मेरे वीर स्वामी ने उन पाँच सौ मल्लों से अकेले युद्ध आरम्भ किया और मुझे आज्ञा दी-‘तुम निर्भय होकर जाओ, सरोवर में स्नान करो या जल पी लो।’

महामाया : उस युद्ध में क्या हुआ?

मल्लिका : वैसी वाण-विद्या पाण्डवों की कहानी में मैंने सुनी थी। देखा, उनके धनुष कटे थे और कमरबन्ध के बन्धन से ही वे चल सकते थे। जब वे समीप आकर खड्ग-युद्ध में आह्वान करने लगे, तब स्वामी ने कहा-‘पहले अपने शरीर की अवस्था को देखो, मैं अर्द्धमृतक घायलों पर अस्त्र नहीं चलाता।’ फिर उन्होंने ललकारकर कहा-‘वीर मल्लगण, जाओ, अस्त्रवैद्य से अपनी चिकित्सा कराओ, बीच में जो अपनी कमरबन्ध खोलेगा, उसकी मृत्यु निश्चित है!’ मल्ल-महिलाओं की ईर्ष्या और उस सरोवर का जल स्वेच्छा से पान कर मैं कोसल लौट आई।

महामाया : आश्चर्य, ऐसी बाण-विद्या तो अब नहीं देखने में आती! ऐसी वीरता तो विश्वास करने की बात ही है, फिर भी मल्लिका! राजशक्ति का प्रलोभन, उसका आदर-अच्छा नहीं है, विष का लड्डू है, गन्धर्वनगर का प्रकाश है। कब क्या परिणाम होगा-निश्चय नहीं है और इसी वीरता से महाराज को आतंक हो गया है। यद्यपि मैं इस समय निरादृत हूँ, फिर भी मुझसे उनकी बातें छिपी नहीं हैं। मल्लिका! मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, इसलिए कहती हूँ…

मल्लिका : क्या कहना चाहती हो, रानी?

महामाया : गुप्त आज्ञापत्र शैलेन्द्र डाकू के नाम जा चुका है, कि यदि तुम बन्धुल का वध कर सकोगे, तो तुम्हारे पिछले सब अपराध क्षमा कर दिए जाएँगे, और तुम उनके स्थान पर सेनापति बनाए जाओगे।

मल्लिका : किन्तु शैलेन्द्र एक वीर पुरुष है। वह गुप्त हत्या क्यों करेगा? यदि वह प्रकट रूप से युद्ध करेगा, तो मुझे निश्चय है कि कोसल के सेनापति उसे अवश्य बन्दी बनाएँगे।

महामाया : किन्तु मैं जानती हूँ कि वह ऐसा करेगा, क्योंकि प्रलोभन बुरी वस्तु है।

मल्लिका : रानी! बस करो! मैं प्राणनाथ को अपने कर्त्तव्य से च्युत नहीं करा सकती, और उनसे लौट आने का अनुरोध नहीं कर सकती। सेनापति का रामभक्त कुटुम्ब कभी विद्रोही नहीं होगा और राजा की आज्ञा से वह प्राण दे देना अपना धर्म समझेगा-जब तक कि स्वयं राजा, राष्ट्र का द्रोही न प्रमाणित हो जाए।

महामाया : क्या कहूँ! मल्लिका, मुझे दया आती है और तुमसे स्नेह भी है; क्योंकि तुम्हें पुत्रवधू बनाने की बड़ी इच्छा थी; किन्तु घमण्डी कोसल नरेश ने उसे अस्वीकार किया। मुझे इसका बड़ा दुःख है; इसीलिए तुम्हें सचेत करने आई थी।

मल्लिका : बस, रानी बस! मेरे लिए मेरी स्थिति अच्छी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी। तुम्हारे दुर्विनीत राजकुमार से न ब्याही जाने में मैं अपना सौभाग्य ही समझती हूँ। दूसरे की क्यों, अपनी ही दशा देखो, कोसल की महिषी बनी थीं, अब…

महामाया : ( क्रोध से ) मल्लिका, सावधान! मैं जाती हूँ।

प्रस्थान।

मल्लिका : गर्वीली स्त्री, तुझे राजपद की बड़ी अभिलाषा थी; किन्तु मुझे कुछ नहीं, केवल स्त्री-सुलभ सौजन्य और समवेदना तथा कर्त्तव्य और धैर्य की शिक्षा मिली है। भाग्य जो कुछ दिखाए।

( पट – परिवर्तन )

 

चतुर्थ दृश्य

स्थान – काशी में श्यामा का गृह

श्यामा बैठी है।

श्यामा : ( स्वगत ) शैलेन्द्र! यह तुमने क्या किया-मेरी प्रणयलता पर कैसा वज्रपात किया! अभागे बन्धुल को ही क्या पड़ी थी कि उसने द्वन्द्वयुद्ध का आह्वान स्वीकार कर लिया! कोसल का प्रधान सेनापति छल से मारा गया है। और उसी के हाथ से घायल होकर तुम भी बन्दी हुए। प्रिय शैलेन्द्र! तुम्हें किस तरह बचाऊँ-( सोचती है )

समुद्रदत्त : श्यामा! तुम्हारे रूप की प्रशंसा सुनकर यहाँ चले आने का साहस हुआ है। क्या मैंने कुछ अनुचित किया?

श्यामा : ( देखती हुई ) नहीं श्रीमान्, यह तो आपका घर है। श्यामा आतिथ्य धर्म को भूल नहीं सकती-यह कुटीर आपकी सेवा के लिए सदैव प्रस्तुत है। सम्भवतः आप परदेसी हैं और इस नगर में नवागत व्यक्ति हैं। बैठिए-क्या आज्ञा है!

समुद्रदत्त : ( बैठता हुआ ) हाँ सुन्दरी, मैं नवागत व्यक्ति हूँ, किन्तु एक बार और आ चुका हूँ-तभी तुम्हारे रूप की ज्वाला ने मुझे पतंग बनाया था, अब उसमें जलने के लिए आया हूँ। भला इतनी भी कृपा न होगी?

श्यामा : मैं आपसे विनती करती हूँ कि पहले आप ठण्डे होइए और कुछ थकावट मिटाइए, फिर बातें होंगी। विजया! श्रीमान् को विश्रामगृह में लिवा जा।

विजया आती है और समुद्रदत्त को लिवा जाती है।

एक दासी का प्रवेश।

दासी : स्वामिनी! दण्डनायक ने कहा है कि श्यामा की आज्ञा ही मेरे लिए सब कुछ है। हजार मोहरों की आवश्यकता नहीं, केवल एक मनुष्य उसके स्थान में चाहिए, क्योंकि सेनापति की हत्या हो गई है, और यह बात भी छिपी नहीं है कि शैलेन्द्र पकड़ा गया है। तब, उसका कोई प्रतिनिधि चाहिए जो सूली पर रातोंरात चढ़ा दिया जाए। अभी किसी ने उसे पहचाना नहीं है।

श्यामा : अच्छा, सुन चुकी। जा, शीघ्र संगीत का सम्भार ठीक कर; एक बड़े सम्भ्रान्त सज्जन आए हैं। शीघ्र जा, देर न कर…

दासी जाती है।

( स्वगत ) स्वण-पिंजर में भी श्यामा को क्या वह सुख मिलेगा-जो उसे हरी डालों पर कसैले फलों को चखने में मिलता है? मुक्त नील गगन में अपने छोटे-छोटे पंख फैला कर जब वह उड़ती है; तब जैसी उसकी सुरीली तान होती है, उसके सामने तो सोने के पिंजरे में उसका गान क्रन्दन ही है। मैं उसी श्यामा की तरह, जो स्वतन्त्र है, राजमहल की परतन्त्रता से बाहर आई हूँ। हँसूँगी और हँसाऊँगी, रोऊँगी और रुलाऊँगी! फूल की तरह आई हूँ, परिमल की तरह चली जाऊँगी। स्वप्न की चन्द्रिका में मलयानिल की सेज पर खेलूँगी। फूलों की धूल से अंगराग बनाऊँगी, चाहे उसमें कितनी ही कलियाँ क्यों न कुचलनी पड़ें। चाहे कितनों ही के प्राण जाएँ, मुझे कुछ चिन्ता नहीं! कुम्हला कर, फूलों को कुचल देने में ही सुख है।

समुद्रदत्त का प्रवेश।

श्यामा : ( खड़ी होकर ) कोई कष्ट तो नहीं हुआ? दासियाँ दुर्विनीत होती हैं, क्षमा कीजिएगा।

समुद्रदत्त : सुन्दरियों की तुम महारानी हो और तुम वास्तव में उसी तरह रहती भी हो; तब जैसा गृहस्थ होगा, वैसे आतिथ्य की भी सम्भावना है-बड़ा सुख मिला, हृदय शीतल हो गया।

श्यामा : आप तो मेरी प्रशंसा करके मुझे बार-बार लज्जित करते हैं।

समुद्रदत्त : सुन्दरी! मैं कह तो नहीं सकता; किन्तु मैं बिना मूल्य का दास हूँ। अनुग्रह करके कोमल कण्ठ से कुछ सुनाओ।

श्यामा : जैसी आज्ञा।

बजाने वाले आते हैं।

( गान और नृत्य )

चला है मन्थर गति में पवन रसीला नन्दन कानन का

नन्दन कानन का, रसीला नन्दन कानन का

फूलों पर आनन्द भैरवी गाते मधुकर वृन्द,

बिखर रही है किस यौवन की किरण, खिला अरविन्द,

ध्यान है किसके आनन का

नन्दन कानन का, रसीला नन्दन कानन का ।। च.।।

उषा सुनहला मद्य पिलाती, प्रकृति बरसाती फूल,

मतवाले होकर देखो तो विधि-निषेध को भूल,

आज कर लो अपने मन का।

नन्नद कानन का, रसीला नन्दन कानन का ।। च.।।

समुद्रदत्त : अहा! श्यामा का-सा कण्ठ भी है। सुन्दरी, तुम्हारी जैसी प्रशंसा सुनी थी, वैसी ही तुम हो! एक बार इस तीव्र मादक को और पिला दो। पागल हो जाने के लिए इन्द्रियाँ प्रस्तुत हैं।

श्यामा इंगित करती है , सब जाते हैं।

श्यामा : क्षमा कीजिए, मैं इस समय बड़ी चिन्तित हूँ, इस कारण आपको प्रसन्न न कर सकी। अभी दासी ने आकर एक बात ऐसी कही है कि मेरा चित्त चंचल हो उठा। केवल शिष्टाचारवश इस समय मैंने आपको गाना सुनाया…

समुद्रदत्त : वह कैसी बात है, क्या मैं भी सुन सकता हूँ?

श्यामा : ( संकोच से ) आप अभी तो विदेश से आ रहे हैं, मुझसे कोई घनिष्ठता भी नहीं, तब कैसे अपना हाल कहूँ।

समुद्रदत्त : सुन्दरी! यह तुम्हारा संकोच व्यर्थ है।

श्यामा : मेरा एक सम्बन्धी किसी अपराध में बन्दी हुआ है, दण्डनायक ने कहा है कि यदि रात-रात में मेरे पास हजार मोहरें पहुँच जाएँ, तो मैं इसे छोड़ दूँगा, नहीं तो नहीं।

रोती है।

समुद्रदत्त : तो इसमें कौन-सी चिन्ता की बात है। मैं देता हूँ; इन्हें भेज दो। ( स्वगत ) मैं भी तो षड्यन्त्र करने आया हूँ-इसी तरह दो-चार अंतरंग मित्र बना लूँगा, जो समय पर काम आएँ। दण्डनायक से भी समझ लूँगा-कोई चिन्ता नहीं।

श्यामा : ( मोहरों की थैली देकर ) तो दासी पर दया करके इसे दे आइए, क्योंकि मैं किस पर विश्वास करके इतना धन भेज दूँ! और यदि आपको पहचाने जाने की शंका हो तो मैं आपका अभी वेश बदल सकती हूँ।

समुद्रदत्त : अजी, मोहरें तो मेरे पास हैं, इनकी क्या आवश्यकता है?

श्यामा : आपकी कृपा है। वह भी, मेरी ही हैं, किन्तु इन्हें ही ले जाइए; नहीं तो आप इसे भी वार-वनिताओं की एक चाल समझिएगा।

समुद्रदत्त : भला यह कैसी बात-सुन्दरी श्यामा, तुम मेरी हँसी उड़ाती हो! तुम्हारे लिए यह प्राण प्रस्तुत है। बात इतनी ही है कि वह मुझे पहचानता है।

श्यामा : नहीं, यह तो मेरी पहली बात आपको माननी ही होगी। इतना बोझ मुझ पर न दीजिए कि मैत्री में चतुरता की गन्ध आने लगे और हम लोगों को एक-दूसरे पर शंका करने का अवकाश मिले। मैं आपका वेश बदल देती हूँ।

समुद्रदत्त : अच्छा प्रिये! ऐसा ही होगा। मेरा वेश-परिवर्तन करा दो।

श्यामा वेश बदलती है और समुद्रदत्त मोहरों की थैली लेकर अकड़ता हुआ जाता है।

श्यामा : जाओ बलि के बकरे, जाओ! फिर न आना। मेरा शैलेन्द्र, मेरा प्यारा शैलेन्द्र!

तुम्हारी मोहनी छवि पर निछावर प्राण हैं मेरे।

अखिल भूलोक बलिहारी मधुर मृदु हास पर तेरे।।

( पट – परिवर्तन )

 पंचम दृश्य

स्थान – सेनापति बन्धुल का गृह

मल्लिका और दासी।

मल्लिका : संसार में स्त्रियों के लिए पति ही सब कुछ है, किन्तु हाय! आज मैं उसी सुहाग से वंचित हो गई हूँ। हृदय थरथरा रहा है, कण्ठ भरा आता है-एक निर्दय चेतना सब इन्द्रियों को अचेतन और शिथिल बनाए दे रही है। आह! ( ठहरकर और निःश्वास लेकर ) हे प्रभु! मुझे बल दो-विपत्तियों को सहन करने के लिए-बल दो! मुझे विश्वास दो कि तुम्हारी शरण जाने पर कोई भय नहीं रहता, विपत्ति और दुःख उस आनन्द के दास बन जाते हैं, फिर सांसारिक आतंक उसे नहीं डरा सकते हैं। मैं जानती हूँ कि मानव-हृदय अपनी दुर्बलताओं में ही सबल होने का स्वाँग बनाता है। किन्तु मुझे उस बनावट से, उस दम्भ से, बचा लो! शान्ति के लिए साहस दो-बल दो!!

दासी : स्वामिनी! धैर्य धारण कीजिए।

मल्लिका : सरला! धैर्य न होता, तो अब तक यह हृदय फट जाता- यह शरीर निस्पन्द हो जाता। यह वैधव्य-दुःख नारी-जाति के लिए कैसा कठोर अभिशाप है, यह किसी भी स्त्री को अनुभव न करना पड़े।

दासी : स्वामिनी, इस दुःख में भगवान् ही सान्त्वना दे सकेंगे-उन्हीं का अवलम्ब है।

मल्लिका : एक बात स्मरण हो आई, सरला!

दासी : क्या स्वामिनी?

मल्लिका : सद्धर्म के सेनापति सारिपुत्र मौद्गलायन को कल मैं निमन्त्रण दे आई हूँ, आज वे आवेंगे। देख, यदि न हुआ हो तो भिक्षा का प्रबन्ध शीघ्र कर, जा-शीघ्र जा। ( दासी जाती है। ) तथागत! तुम धन्य हो, तुम्हारे उपदेशों से हृदय निर्मल हो जाता है। तुमने संसार को दुःखमय बतलाया और उससे छूटने का उपाय भी सिखाया, कीट से लेकर इन्द्र तक की समता घोषित की; अपवित्रों को अपनाया, दुखियों को गले लगाया, अपनी दिव्य करुणा की वर्षा से विश्व को आप्लावित किया-अमिताभ, तुम्हारी जय हो!

सरला आती है।

सरला : स्वामिनी! भिक्षा का आयोजन सब ठीक है, कोई चिन्ता नहीं, किन्तु…

मल्लिका : किन्तु नहीं, सरला! मैं भी व्यवहार जानती हूँ, आतिथ्य परम धर्म है। मैं भी नारी हूँ, नारी के हृदय में जो हाहाकार होता है, वह मैं अनुभव कर रही हूँ। शरीर की धमनियाँ खिंचने लगती हैं, जी रो उठता है; तब भी कर्त्तव्य करना ही होगा।

सारिपुत्र और आनन्द का प्रवेश।

मल्लिका : जय हो! अमिताभ की जय हो-दासी वन्दना करती है। स्वागत!

सारिपुत्र : शान्ति मिले-सन्तोष में तृप्ति हो। देवि! हम लोग आ गए- भिक्षा प्रस्तुत है।

मल्लिका : देव! यथाशक्ति प्रस्तुत है। पावन कीजिए। चलिए।

दासी जल लाती है , मल्लिका पैर धुलाती है। दोनों बैठते हैं और भोजन करते हैं। लाते समय स्वर्णपात्र दासी से गिरकर टूट जाता है। मल्लिका उसे दूसरा लाने को कहती है।

आनन्द : देवि! दासी का अपराध क्षमा करना-जितनी वस्तुएँ बनती हैं, वे सब बिगड़ने ही के लिए। यही उसका परिणाम था; उसमें बेचारी दासी को कलंक मात्र था।

मल्लिका : यथार्थ है!

सारिपुत्र : आनन्द, क्या तुमने समझा कि मल्लिका दासी पर रुष्ट होगी! क्या तुमने अभी नहीं पहचाना! स्वर्ण-पात्र टूटने से इन्हें क्या क्षोभ होगा-स्वामी के मारे जाने का समाचार अभी हम लोगों के आने के थोड़ी ही देर पहले आया है, किन्तु वह भी इन्हें अपने कर्त्तव्य से विचलित नहीं कर सका! फिर यह तो एक धातुपात्र था! ( मल्लिका से ) तुम्हारा धैर्य सराहनीय है! आनन्द! तो, इस मूर्तिमती धर्म-परायणा से कर्त्तव्य की शिक्षा लो।

आनन्द : महिमामयी! अपराध क्षमा हो। आज मुझे विश्वास हुआ कि केवल काषाय धारण कर लेने से ही धर्म पर एकाधिकार नहीं हो जाता, यह तो चित्त-शुद्धि से मिलता है।

मल्लिका : पतितपावन की अमोघ वाणी ने दृश्यों की नश्वरता की घोषणा की है। अब मुझे वह मोह की दुर्बलता-सी दिखाई पड़ती है। उस धर्मशासन से कभी विद्रोह न करूँगी, वह मानव का पवित्र अधिकार है, शान्तिदायक धैर्य का साधन है, जीवन का विश्राम है। ( पैर पकड़ती है ) महापुरुष! आशीर्वाद दीजिए कि मैं इससे विचलित न होऊँ।

सारिपुत्र : उठो, देवि! उठो! तुम्हें मैं क्या उपदेश करूँ? तुम्हारा चरित्र धैर्य का, कर्त्तव्य का, स्वयं आदर्श है। तुम्हारे हृदय में अखण्ड शान्ति है। हाँ, तुम जानती हो कि तुम्हारा शत्रु कौन है-तब भी विश्वमैत्री के अनुरोध से, उससे केवल उदासीन ही न रहो, प्रत्युत द्वेष भी न रखो।

महाराज प्रसेनजित् का प्रवेश।

प्रसेनजित् : महास्थविर! मैं अभिवादन करता हूँ। मल्लिका देवी, मैं क्षमा माँगने आया हूँ।

मल्लिका : स्वागत, महाराज! क्षमा किस बात की

प्रसेनजित् : नहीं-मैंने अपराध किया है। सेनापति बन्धुल के प्रति मेरा हृदय शुद्ध नहीं था-इसलिए उनकी हत्या का पाप मुझे भी लगता है।

मल्लिका : यह अब छिपा नहीं है, महाराज! प्रजा के साथ आप इतना छल, इतनी प्रवंचना और कपट-व्यवहार रखते हैं! धन्य हैं।

प्रसेनजित् : मुझे धिक्कार दो-मुझे शाप दो-मल्लिका! तुम्हारे मुखमण्डल पर ईर्ष्या और प्रतिहिंसा का चिह्न भी नहीं है। जो तुम्हारी इच्छा हो वह कहो, मैं उसे पूर्ण करूँगा।

मल्लिका : ( हाथ जोड़कर ) कुछ नहीं, महाराज! आज्ञा दीजिए कि आपके राज्य से निर्विघ्न चली जाऊँ; किसी शान्तिपूर्ण स्थान में रहूँ! ईर्ष्या से आपका हृदय प्रलय के मध्याह्न का सूर्य हो रहा है, उसकी भीषणता से बचकर किसी छाया में विश्राम करूँ। और कुछ भी मैं नहीं चाहती।

सारिपुत्र : मूर्तिमती करुणे! तुम्हारी विजय है।

हाथ जोड़ता है।

( पट – परिवर्तन )

 षष्ठ दृश्य

स्थान – महाराज बिम्बिसार का गृह

बिम्बिसार और वासवी ।

बिम्बिसार : रात में ताराओं का प्रभाव विशेष रहने से चन्द्र नहीं दिखाई देता और चन्द्रमा का तेज बढ़ने से तारे सब फीके पड़ जाते हैं, क्या इसी को शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष कहते हैं? देवि! कभी तुमने इस पर विचार किया है

वासवी : आर्यपुत्र! मुझे तो विश्वास है कि नीला पर्दा इसका रहस्य छिपाए है, जितना चाहता है, उतना ही प्रकट करता है। कभी निशाकर को छाती पर लेकर खेला करता है, कभी ताराओं को बिखेरता और कृष्णा कुहू के साथ क्रीड़ा करता है।

बिम्बिसार : और कोमल पत्तियों को, जो अपनी डाली में निरीह लटका करती हैं, प्रभंजन क्यों झिंझोड़ता है

वासवी : उसकी गति है, वह किसी से कहता नहीं है कि तुम मेरे मार्ग में अड़ो; जो साहस करता है, उसे हिलना पड़ता है। नाथ! समय भी इसी तरह चला जा रहा है, उसके लिए पहाड़ और पत्ती बराबर हैं।

बिम्बिसार : फिर उसकी गति तो सम नहीं है, ऐसा क्यों?

वासवी : यही समझाने के लिए बड़े-बड़े दार्शनिकों ने कई तरह की व्याख्याएँ की हैं, फिर भी प्रत्येक नियम में अपवाद लगा दिए हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपवाद नियम पर है, या नियामक पर। सम्भवतः उसे ही लोग बवण्डर कहते हैं।

बिम्बिसार : तब तो, देवि! प्रत्येक असम्भावित घटना के मूल में यही बवण्डर है। सच तो यह है कि विश्व-भर में स्थान-स्थान पर वात्याचक्र हैं; जल में उसे भँवर कहते हैं, स्थल पर उसे बवण्डर कहते हैं, राज्य में विप्लव, समाज में उच्छृंखलता और धर्म में उसे पाप कहते हैं। चाहे इन्हें नियमों का अपवाद कहो, चाहे बवण्डर-यही न

छलना का प्रवेश।

बिम्बिसार : यह लो, हम लोग तो बवण्डर की बातें करते थे, तुम यहाँ कैसे पहुँच गईं राजमाता महादेवी को इस दरिद्र कुटीर में क्या आवश्यकता हुई?

छलना : मैं बवण्डर हूँ-इसीलिए जहाँ मैं चाहती हूँ, असम्भावित रूप से चली जाती हूँ और देखना चाहती हूँ कि इस प्रवाह में कितनी सामर्थ्य है-इसमें आवर्त्त उत्पन्न कर सकती हूँ कि नहीं!

वासवी : छलना! बहन! तुमको क्या हो गया है

छलना : प्रमाद-और क्या! अभी सन्तोष नहीं हुआ इतना उपद्रव करा चुकी हो, और भी कुछ शेष है

वासवी : क्यों, अजात तो अच्छी तरह है कुशल तो है?

छलना : क्या चाहती हो समुद्रदत्त काशी में मारा ही गया। कोसल और मगध में युद्ध का उपद्रव हो रहा है। अजात भी उसमें गया है। साम्राज्य-भर में आतंक है।

बिम्बिसार : युद्ध में क्या हुआ? ( मुँह फिराकर ) अथवा मुझे क्या?

छलना : शैलेन्द्र नाम के डाकू ने द्वन्द्वयुद्ध में आह्वान करके फिर धोखा देकर कोसल के सेनापति को मार डाला। सेनापति के मर जाने से सेना घबराई थी, उसी समय अजात ने आक्रमण कर दिया और विजयी हुआ-काशी पर अधिकार हो गया।

वासवी : तब इतना घबराती क्यों हो? अजात को रण-दुर्मद साहसी बनाने के लिए ही तो तुम्हें इतनी उत्कण्ठा थी। राजकुमार को तो ऐसी उद्धत शिक्षा तुम्हीं ने दी थी। फिर उलाहना क्यों?

छलना : उलाहना क्यों न दूँ-जबकि तुमने जान-बूझकर यह विप्लव खड़ा किया है। क्या तुम इसे नहीं दबा सकती थीं; क्योंकि वह तो तुम्हारे पिता से तुम्हें मिला हुआ प्रान्त था।

वासवी : जिसने दिया था, यदि वह ले ले, तो मुझे क्या अधिकार है कि मैं उसे न लौटा दूँ? तुम्हीं बतलाओ कि मेरा अधिकार छीन कर जब आर्यपुत्र ने तुम्हें दे दिया, तब भी मैंने कोई विरोध किया था

छलना : यह ताना सुनने मैं नहीं आई हूँ। वासवी, तुमको तुम्हारी असफलता सूचित करने आई हूँ।

बिम्बिसार : तो राजमाता को कष्ट करने की क्या आवश्यकता थी यह तो एक सामान्य अनुचर कर सकता था।

छलना : किन्तु वह मेरी जगह तो नहीं हो सकता था और सन्देश भी अच्छी तरह से नहीं कहता। वासवी के मुख की प्रत्येक सिकुड़न पर इस प्रकार लक्ष्य न रखता, न तो वासवी को इतना प्रसन्न ही कर सकता।

बिम्बिसार : ( खड़े होकर ) छलना! मैंने राजदण्ड छोड़ दिया है; किन्तु मनुष्यता ने अभी मुझे परित्याग नहीं किया है। सहन की भी सीमा होती है। अधम नारी! चली जा। तुझे लज्जा नहीं-बर्बर लिच्छिवि-रक्त!

वासवी : बहन! जाओ, सिंहासन पर बैठ कर राजकार्य देखो। व्यर्थ झगड़ने से तुम्हें क्या सुख मिलेगा और अधिक तुम्हें क्या कहूँ; तुम्हारी बुद्धि!

छलना जाती है।

वासवी : ( प्रार्थना करती है -)

दाता सुमति दीजिए!

मान-हृदय-भूमि करुणा से सींचकर

बोधक-विवेक-बीज अंकुरित कीजिए

दाता सुमति दीजिए।।

जीवक का प्रवेश।

जीवक : जय हो, देव!

बिम्बिसार : जीवक, स्वागत! तुम बड़े समय पर आए! इस समय हृदय बड़ा उद्विग्न था। कोई नया समाचार सुनाओ।

जीवक : कौशाम्बी के समाचार तो लिखकर भेज चुका हूँ। नया समाचार यह है कि मागन्धी का सब पड्यन्त्र खुल गया और राजकुमारी पद्मावती का गौरव पूर्ववत् हो गया। वह दुष्टा मागन्धी महल में आग लगाकर जल मरी!

बिम्बिसार : बेटी पद्मा! प्राण बचे। इतने दिनों तक बड़ी दुःखी रही, क्यों जीवक?

वासवी : और कोसल का क्या समाचार है? विरुद्धक को भाई ने क्षमा किया या नहीं? वह आजकल कहाँ है?

जीवक : वही तो काशी का शैलेन्द्र है। उसने मगध-नरेश- नहीं-नहीं- कुमार कुणीक से मिलकर कोसल सेनापति बन्धुल को मार डाला और स्वयं इधर-उधर विद्रोह करता फिर रहा है।

वासवी : यह क्या है! भगवन्! बच्चों को यह क्या सूझी है? क्या यही राजकुल की शिक्षा है?

जीवक : और महाराज प्रसेनजित्, घायल होकर रणक्षेत्र से लौट गए। इधर कोई और नई बात हुई हो, तो मैं नहीं जानता।

बिम्बिसार : जीवक, अब तुम विश्राम करो। अब और कोई समाचार सुनने की इच्छा नहीं है। संसार-भर में विद्रोह, संघर्ष, हत्या, अभियोग, षड्यन्त्र और प्रताड़ना है। यही सब तुम सुनाओगे, ऐसा मुझे निश्चय हो गया। जाने दो। एक शीतल निःश्वास लेकर तुम विश्व के वात्याचक्र से अलग हो जाओ और इस पर प्रलय के सूर्य की किरणों से तप कर गलते हुए गीले लोहे की वर्षा होने दो। अविश्वास की आँधियों को सरपट दौड़ने दो। पृथ्वी के प्राणियों में अन्याय बढ़े, जिससे दृढ़ होकर लोग अनीश्वरवादी हो जाएँ, और प्रतिदिन नई समस्या हल करते-करते कुटिल कृतघ्न-जीव मूर्खता की धूल उड़ावें-और विश्व-भर में इस पर एक उन्मत्त अट्टहास हो। ( उन्मत्त भाव से जाता है )

( पट – परिवर्तन )

 सप्तम दृश्य

स्थान – कोसल की सीमा

मल्लिका की कुटी में मल्लिका और दीर्घकारायण।

कारायण : नहीं, मैं कभी इसका अनुमोदन नहीं कर सकता। आप चाहे इसे धर्म समझें; किन्तु साँप को जीवनदान करना कभी भी लोकहितकर नहीं है।

मल्लिका : कारायण, तुम्हारा रक्त अभी बहुत खौल रहा है। तुम्हारी प्रतिहिंसा की बर्बरता वेगवती है, किन्तु सोचो, विचारो, जिसके हृदय में विश्वमैत्री के द्वारा करुणा का उद्रेक हुआ है, उसे अपकार का स्मरण क्या कभी अपने कर्त्तव्य से विचलित कर सकता है?

कारायण : आप देवी हैं। सौरमण्डल से भिन्न जो केवल कल्पना के आधार पर स्थित है, उस जगत् की बातें आप सोच सकती हैं। किन्तु हम इस संघर्षपूर्ण जगत् के जीव हैं, जिसमें कि शून्य भी प्रतिध्वनि देता है, जहाँ किसी को वेग से कंकड़ी मारने पर वही कंकड़ी-मारने वाले की ओर-लौटने की चेष्टा करती है। इसलिए मैं तो यही कहूँगा कि इस मरणासन्न घमण्डी और दुर्वृत्त कोसल-नरेश की रक्षा आपको नहीं करनी चाहिए।

मल्लिका : अपना कर्त्तव्य मैं अच्छी तरह जानती हूँ। करुणा की विजय-पताका के नीचे हमने प्रयाण करने का दृढ़ विचार करके उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है। अब एक पग भी पीछे हटने का अवकाश नहीं। विश्वासी सैनिक के समान नश्वर जीवन का बलिदान करूँगी-कारायण!

कारायण : तब मैं जाता हूँ-जैसी इच्छा।

मल्लिका : ठहरो, मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूँ। क्या तुम इस युद्ध में नहीं गए थे? क्या तुमने अपने हाथों से जान-बूझकर कोसल को पराजित होने नहीं दिया? क्या सच्चे सैनिक के समान ही तुम इस रणक्षेत्र में खड़े थे और तब भी कोसल-नरेश की यह दुर्दशा हुई? जब तुम इस लघु-सत्य को पालने में असमर्थ हुए, तब तुमसे और महान् स्वार्थ-त्याग की क्या आशा की जाय! मुझे विश्वास है कि यदि कोसल की सेना अपने सत्य पर रहती, तो यह दुःखद घटना न होने पाती।

कारायण : इसमें मेरा क्या अपराध है जैसी सबकी वैसी ही मेरी इच्छा थी। ( कुटी से घायल प्रसेनजित् निकलता है। )

प्रसेनजित् : देवि, तुम्हारे उपकारों का बोझ मुझे असह्य हो रहा है। तुम्हारी शीतलता ने इस जलते हुए लोहे पर विजय प्राप्त कर ली है। बार-बार क्षमा माँगने पर हृदय को सन्तोष नहीं होता। अब मैं श्रावस्ती जाने की आज्ञा चाहता हूँ।

मल्लिका : सम्राट्! क्या आपको मैंने बन्दी कर रखा है? यह कैसा प्रश्न! बड़ी प्रसन्नता से आप जा सकते हैं!

प्रसेनजित् : नहीं, देवि! इस दुराचारी के पैरों में तुम्हारे उपकारों की बेड़ी और हाथों में क्षमा की हथकड़ी पड़ी है। जब तक तुम कोई आज्ञा देकर इसे मुक्त नहीं करोगी, यह जाने में असमर्थ है।

मल्लिका : कारायण! यह तुम्हारे सम्राट् हैं-जाओ; इन्हें राजधानी तक सकुशल पहुँचा दो, मुझे तुम्हारे बाहुबल पर भरोसा है, और चरित्र पर भी।

प्रसेनजित् : कौन कारायण, सेनापति बन्धुल का भागिनेय?

कारायण : हाँ, श्रीमान्! वही कारायण अभिवादन करता है।

प्रसेनजित् : कारायण! माता ने आज्ञा दी है, तुम मुझे कल पहुँचा दोगे देखो जननी की यह मूर्ति!-विपद में बच्चे की तरह उसने मेरी सेवा की है। क्या तुम इसमें भक्ति करते हो यदि तुमने इन दिव्य चरणों की भक्ति पाई है, तो तुम्हारा जीवन धन्य है।

मल्लिका का पैर पकड़ता है।

मल्लिका : उठिए सम्राट्! उठिए! मर्यादा भंग करने का आपको भी अधिकार नहीं है।

प्रसेनजित् : यदि आज्ञा हो तो मैं दीर्घकारायण को अपना सेनापति बनाऊँ और इसी वीर में स्वर्गीय सेनापति बन्धुल की प्रतिकृति देख कर अपने कुकर्म का प्रायश्चित करूँ। देवि! मैं स्वीकार करता हूँ कि महात्मा बन्धुल के साथ मैंने घोर अन्याय किया है! और आपने क्षमा करके मुझे कठोर दण्ड दिया है। हृदय में इसकी बड़ी ज्वाला है, देवि! एक अभिशाप तो दे दो, जिसमें नरक की ज्वाला शान्त हो जाय और पापी प्राण निकलने में सुख पावे।

मल्लिका : अतीत के वज्र-कठोर हृदय पर जो कुटिल-रेखा-चित्र खिंच गए हैं; वे क्या कभी मिटेंगे? यदि आपकी इच्छा है तो वर्तमान में कुछ रमणीय सुन्दर चित्र खींचिए, जो भविष्य में उज्ज्वल होकर दर्शकों के हृदय को शान्ति दें। दूसरों को सुखी बनाकर सुख पाने का अभ्यास कीजिए।

प्रसेनजित् : आपका आशीर्वाद सफल हो! चलो कारायण!

दोनों नमस्कार करके जाते हैं।

मल्लिका : ( प्रार्थना करती है -)

अधीर हो न चित्त विश्व-मोह-जाल में।

यह वेदना-विलोल-वीचि-मय समुद्र है।।

है दुःख का भँवर चला कराल चाल में।

वह भी क्षणिक, इसे कहीं टिकाव है नहीं।।

सब लौट जाएँगे उसी अनन्त काल में।

अधीर हो न चित्त विश्व-मोह-जाल में।।

अजातशत्रु : ( प्रवेश करके ) कहाँ गया! मेरे क्रोध का कन्दुक, मेरी क्रूरता का खिलौना, कहाँ गया रमणी! शीघ्र बता-वह घमण्डी कोसल-सम्राट् कहाँ गया?

मल्लिका : शान्त हो, राजकुमार कुणीक! शान्त हो, तुम किसे खोजते हो बैठो! अहा, यह सुन्दर मुख, इसमें भयानकता क्यों ले आते हो? सहज वदन को क्यों विकृत करते होन शीतल हो; विश्राम लो। देखो यह अशोक की शीतल छाया तुम्हारे हृदय को कोमल बना देगी, बैठ जाओ।

अजातशत्रु : ( मुग्ध – सा बैठ जाता है ) क्या यहाँ प्रसेनजित् नहीं रहा, अभी मुझे गुप्तचर ने समाचार दिया है।

मल्लिका : हाँ, इसी आश्रम में उनकी शुश्रूषा हुई और वे स्वस्थ होकर अभी-अभी गए हैं। पर तुम उन्हें लेकर क्या करोगे? तुम उष्ण रक्त चाहते हो, या इस दौड़-धूप के बाद शीतल हिम-जल युद्ध में जब यशोर्जन कर चुके, तब हत्या करके क्या अब हत्यारे बनोगे? वीरों को विजय की लिप्सा होना चाहिए, न कि हत्या की।

अजातशत्रु : देवि! आप कौन हैं हृदय नम्र होकर आप-ही-आप प्रणाम करने को झुक रहा है। ऐसी पिघला देने वाली वाणी तो मैंने कभी नहीं सुनी।

मल्लिका : मैं स्वर्गीय कोसल-सेनापति की विधवा हूँ, जिसके जीवन में तुम्हारी बड़ी हानि थी और षड्यन्त्र के द्वारा मरवाकर तुमने काशी का राज्य हस्तगत किया है।

अजातशत्रु : यह पड्यन्त्र स्वयं कोसल-नरेश का था, क्या आप नहीं जानतीं?

मल्लिका : जानती हूँ, और यह भी जानती हूँ कि सब मृत्पिंड इसी मिट्टी में मिलेंगे।

अजातशत्रु : तब भी आपने उस अधम जीवन की रक्षा की ऐसी क्षमा आश्चर्य! यह देव-कर्त्तव्य…।

मल्लिका : नहीं राजकुमार, यह देवता का नहीं-मनुष्य का कर्त्तव्य है। उपकार, करुणा, सम्वेदना और पवित्रता मानव-हृदय के लिए ही बने हैं।

अजातशत्रु : क्षमा हो, देवि! मैं जाता हूँ-अब कोसल पर आक्रमण नहीं करूँगा। इच्छा थी कि इसी समय इस दुर्बल राष्ट्र को हस्तगत करूँ, किन्तु नहीं; अब लौट जाता हूँ।

मल्लिका : जाओ, गुरुजनों को सन्तुष्ट करो।

अजात जाता है।

( पट – परिवर्तन )

 

अष्टम दृश्य

स्थान – श्रावस्ती का एक उपवन

श्यामा और शैलेन्द्र मद्यपान करते हुए।

शैलेन्द्र : प्रिये, यहाँ आकर मन बहल गया।

श्यामा : क्या वहाँ मन नहीं लगता था? क्या रूप-रस से तृप्ति हो गई?

शैलेन्द्र : नहीं श्यामा! तुम्हारे सौन्दर्य ने तो मुझे भुला दिया है कि मैं डाकू था। मैं स्वयं भूल गया हूँ कि मैं कौन था, मेरा उद्देश्य क्या था, और तुम एक विचित्र पहेली हो। हिंस्र पशु को पालतू बना लिया, आलसपूर्ण सौन्दर्य की तृप्णा मुझे किस लोक में ले जा रही है तुम क्या हो, सुन्दरी?

पान करता है।

श्यामा : ( गाती है -)

निर्जन गोधूली प्रान्तर में खोले पर्णकुटी के द्वार,

दीप जलाए बैठे थे तुम किए प्रतीक्षा पर अधिकार।

बटमारों से ठगे हुए की ठुकराए की लाखों से,

किसी पथिक की राह देखते अलस अकम्पित आँखों से-

पलकें झुकी यवनिका-सी थीं अन्तस्तल के अभिनय में।

इधर वेदना श्रम-सीकर आँसू की बूँदें परिचय में।

फिर भी परिचय पूछ रहे हो, विपुल विश्व में किसको दूँ

चिनगारी श्वासों में उठती, रो लूँ, ठहरो दम ले लूँ

निर्जन कर दो क्षण भर कोने में, उस शीतल कोने में,

यह विश्रांल सँभल जाएगा सहज व्यथा के सोने में।

बीती बेला, नील गगन तम, छिन्न विपंच्ची, भूला प्यार,

क्षमा-सदृश छिपना है फिर तो परिचय देंगे आँसू-हार।

शैलेन्द्र उसे पान कराता है।

शैलेन्द्र : ओह, मैं बेसुध हो चला हूँ-संगीत के साथ सौन्दर्य और सुरा ने मुझे अभिभूत कर लिया है। तब यही सही।

दोनों पान करते हैं। श्यामा सो जाती है।

शैलेन्द्र : ( स्वगत ) काशी के उस संकीर्ण भवन में छिपकर रहते-रहते चित्त घबरा गया था। समुद्रदत्त के मारे जाने का मैं ही कारण था, इसीलिए प्रकाश्य रूप से अजातशत्रु से मिल कर कोई कार्य भी नहीं कर सकता था। इस पामरी की गोद में मुँह छिपा कर कितने दिन बिताऊँ? हमारे भावी कार्यों में अब यह विघ्नस्वरूप हो रही है। यह प्रेम दिखा कर मेरी स्वतन्त्रता हरण कर रही है। अब नहीं, इस गर्त्त में अब नहीं गिरा रहूँगा। कर्मपथ के कोमल और मनोहर कण्टकों को कठोरता से-निर्दयता से-हटाना ही पड़ेगा। तब, आज से अच्छा समय कहाँ-

श्यामा सोई हुई भयानक स्वप्न देख रही है। चौंककर उठती है।

श्यामा : शैलेन्द्र…

शैलेन्द्र : क्यों, प्रिये!

श्यामा : प्यास लगी है।

शैलेन्द्र : क्या पियोगी?

श्यामा : जल।

शैलेन्द्र : प्रिये! जल तो नहीं है। यह शीतल पेय है, पी लो।

श्यामा : विष! ओह सिर घूम रहा है। मैं बहुत पी चुकी हूँ। अब…जल…भयानक स्वप्न। क्या तुम मुझे जलते हुए हलाहल की मात्रा पिला दोगे?

( अर्द्ध – निमीलित नेत्रों से देखती हुई। )

अमृत हो जाएगा, विष भी पिला दो हाथ से अपने।

पलक ये छक चुके हैं चेतना उनमें लगी कँपने।।

विकल हैं इन्द्रियाँ, हाँ देखते इस रूप के सपने।

जगत विस्मृत हृदय पुलकित लगा वह नाम है जपने।।

शैलेन्द्र : छिः! यह क्या कह रही हो कोई स्वप्न देख रही हो क्या लो, थोड़ी पी लो। ( पिला देता है )

श्यामा : मैंने अपने जीवन-भर में तुम्हीं को प्यार किया है। तुम मुझे धोखा तो नहीं दोगे? ओह! कैसा भयानक स्थान है! उसी स्वप्न की तरह…

शैलेन्द्र : क्या बक रही हो! सो जाओ, वन-विहार से थकी हो।

श्यामा : ( आँख बन्द किए हुए ) क्यों यहाँ ले आए! क्या घर में सुख नहीं मिलता था?

शैलेन्द्र : कानन की हरी-भरी शोभा देखकर जी बहलाना चाहिए, क्यों तुम इस प्रकार बिछली जा रही हो?

श्यामा : नहीं-नहीं, मैं आँख न खोलूँगी, डर लगता है, तुम्हीं पर मेरा विश्वास है, यहीं रहो।

निद्रित होती है।

शैलेन्द्र : ( स्वगत ) सो गई! आह! हृदय में एक वेदना उठती है-ऐसी सुकुमार वस्तु! नहीं-नहीं! किन्तु विश्वास के बल पर ही इसने समुद्रदत्त के प्राण लिए! यह नागिन है, पलटते देर नहीं। मुझे अभी प्रतिशोध लेना है-दावाग्नि-सा बढ़ कर फैलना है, उसमें चाहे सुकुमार तृणकुसुम हो अथवा विशाल शालवृक्ष; दावाग्नि या अन्धड़ छोटे-छोटे फूलों को बचा कर नहीं चलेगा। तो बस…

श्यामा : ( जागकर ) शैलेन्द्र! विश्वास! देखो कहीं…ओह भयानक… ( आँख बन्द कर लेती है। )

शैलेन्द्र: तब देर क्या! कहीं कोई आ जाएगा। फिर…( श्यामा का गला घोटता है , वह क्रन्दन करके शिथिल हो जाती है। ) बस चलें, पर नहीं, धन की भी आवश्यकता है…

आभूषण उतार ले जाता है।

गौतम बुद्ध और आनन्द का प्रवेश।

आनन्द : भगवन्, देवदत्त ने तो अब बड़े उपद्रव मचाए। तथागत को कलंकित और अपमानित करने के लिए उसने कौन-से उपाय नहीं किए? उसे इसका फल मिलना चाहिए।

गौतम : यह मेरा काम नहीं-वेदना और संज्ञाओं का दुःख अनुभव करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है! हमें अपना कर्त्तव्य करना चाहिए, दूसरों के मलिन कर्मों को विचारने से भी चित्त पर मलिन छाया पड़ती है।

आनन्द : देखिए, अभी चिन्ता को लेकर उसने कितना बड़ा अपवाद लगाना चाहा था-केवल आपकी मर्यादा गिरा देने की इच्छा से।

गौतम : किन्तु सत्य-सूर्य को कहीं कोई छलनी से ढक लेगा? इस क्षणिक प्रवाह में सब विलीन हो जाएंगे मुझे अकार्य करने से क्या लाभ! चिन्ता को ही देखो, अब वह बात खुल गई कि उसे गर्भ नहीं है, वह केवल मुझे अपवाद लगाना चाहती थी। तभी उसकी कैसी दुर्गति हुई। शुद्धबुद्धि की प्ररेणा से सत्कर्म करते रहना चाहिए। दूसरों की ओर उदासीन हो जाना ही शत्रुता की पराकाष्ठा है। आनन्द, दूसरों का उपकार सोचने से अपना हृदय भी कलुषित होता है।

आनन्द : यथार्थ है प्रभु! ( श्यामा के शव को देखकर ) अरे, यह क्या! चलिए, गुरुदेव! यहाँ से शीघ्र हट चलिए। देखिए, अभी यहाँ कोई काण्ड घटित हुआ है।

गौतम : अरे, यह तो कोई स्त्री है, उठाओ आनन्द! इसे सहायता की आवश्यकता है।

आनन्द : तथागत आपके प्रतिद्वन्द्वी इससे बड़ा लाभ उठाएँगे। यह मृतक स्त्री विहार में ले जाकर क्या आप कलंकित होना चाहते हैं!

गौतम : क्या करुणा का आदेश कलंक के डर से भूल जाओगे? यदि हम लोगों की सेवा से वह कष्ट से मुक्त हो गई तब और मैं निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि यह मरी नहीं है। आनन्द, बिलम्ब न करो। यदि यह यों ही पड़ी रही, तब भी तो विहार पीछे ही है। उस अपवाद से हम लोग कहाँ बचेंगे?

आनन्द : प्रभु, जैसी आज्ञा।

उसे उठाकर दोनों ले जाते हैं।

शैलेन्द्र का प्रवेश।

शैलेन्द्र : उसे कोई उठा ले गया। चलो, मैं भी उसके घर में जो कुछ था ले आया। अब कहाँ चलना चाहिए। श्रावस्ती तो अपनी राजधानी है; पर यहाँ अब एक क्षण भी मैं नहीं ठहरूँगा। माता से भेंट हो चुकी, इतना द्रव्य भी हाथ लगा। बस, कारायण से मिलता हुआ एक बार ही सीधे राजगृह। रहा अजात से मिलना; किन्तु अब कोई चिन्ता नहीं; कौन रहस्य खोलेगा? समुद्रदत्त के लिए मैं भी कोई बात बना दूँगा। तो चलूँ, इस संघाराम में कुछ भीड़-सी एकत्र हो रही है, यहाँ ठहरना अब ठीक नहीं। ( जाता है )

एक भिक्षु का प्रवेश।

भिक्षु : आश्चर्य! वह मृत स्त्री जी उठी और इतनी देर में दुष्टों ने कितना आतंक फैला दिया था। समग्र विहार मनुष्यों से भर गया था। दुष्ट जनता को उभाड़ने के लिए कह रहे थे कि पाखंडी गौतम ने ही उसे मार डाला। इस हत्या में गौतम की ही कोई बुरी इच्छा थी! किन्तु उसके स्वस्थ होते ही सबके मुँह में कालिख लग गई। और अब तो लोग कहते हैं कि ‘धन्य हैं, गौतम बड़े महात्मा हैं। उन्होंने मरी हुई स्त्री को जिला दिया!’ मनुष्यों के मुख में भी तो साँपों की तरह दो जीभ हैं। चलूँ देखूँ कोई बुला रहा है । ( जाता है )

रानी शक्तिमती और कारायण का प्रवेश।

रानी : क्यों सेनापति, तुम तो इस पद से सन्तुष्ट होगे अपने मातुल की दशा तो अब तुम्हें भूल गई होगी?

कारायण : नहीं रानी! वह भी इस जन्म में भूलने की बात है! क्या करूँ, मल्लिका देवी की आज्ञा से मैंने यह पद ग्रहण किया है; किन्तु हृदय में बड़ी ज्वाला धधक रही है!

रानी : पर तुम्हें इसके लिए चेष्टा करनी चाहिए; स्त्रियों की तरह रोने से काम न चलेगा। विरुद्धक ने तुमसे भेंट की थी

कारायण : कुमार बड़े साहसी हैं-मुझसे कहने लगे कि ‘अभी मैंने एक हत्या की है और उससे मुझे यह धन मिला है, सो तुम्हें गुप्त-सेना-संगठन के लिए देता हूँ। मैं फिर उद्योग में जाता हूँ। यदि तुमने धोखा दिया, तो स्मरण रखना-शैलेन्द्र किसी पर दया करना नहीं जानता।’ उस समय मैं तो केवल बात ही सुनकर स्तब्ध रह गया। बस स्वीकार करते ही बना, रानी! उस युवक को देखकर मेरी आत्मा काँपती है।

रानी : अच्छा, तो प्रबन्ध ठीक करो। सहायता मैं दूंगी। पर यहाँ भी अच्छा खेल हुआ…।

कारायण : हम लोग भी तो उसी को देखने आए थे। आश्चर्य! क्या जाने कैसे वह स्त्री जी उठी! नहीं तो अभी ही गौतम का सब महात्मापन भूल जाता।

रानी : अच्छा, अब हम लोगों को शीघ्र चलना चाहिए, सब जनता नगर की ओर जा रही है। देखो, सावधान रहना, मेरा रथ भी बाहर खड़ा होगा।

कारायण : कुछ सेना अपनी निज की प्रस्तुत कर लेता हूँ, जो कि राजसेना से बराबर मिली-जुली रहेगी और काम के समय हमारी आज्ञा मानेगी।

रानी : और भी एक कहानी है-कौशाम्बी का दूत आया है। सम्भवतः कौशाम्बी और कोसल की सेना मिलकर अजात पर आक्रमण करेगी। उस समय तुम क्या करोगे?

कारायण : उस समय वीरों की तरह मगध पर आक्रमण करूँगा और सम्भवतः इस बार अवश्य अजात को बन्दी बनाऊँगा। अपने घर की बात अपने घर में ही निपटेगी।

रानी : ( कुछ सोचकर ) अच्छा।

दोनों जाते हैं।

( पट – परिवर्तन )

 

नवम दृश्य

स्थान – कौशाम्बी का पथ।

जीवक और वसन्तक।

वसन्तक : ( हँसता हुआ ) तब इसमें मेरा क्या दोष?

जीवक : जब तुम दिन-रात राजा के समीप रहते हो और उनके सहचर बनने का तुम्हें गर्व है, तब तुमने क्यों नहीं ऐसी चेष्टा की…

वसन्तक : कि राजा बिगड़ जाएँ?

जीवक : अरे बिगड़ जाएँ कि सुधर जाएँ। ऐसी बुद्धि को…

वसन्तक : धिक्कार है, जो इतना भी न समझे कि राजा पीछे चाहे स्वयं सुधर जाएँ, अभी तो हमसे बिगड़ जाएँगे।

जीवक : तब तुम क्या करते हो?

वसन्तक : दिन-रात सीधा किया करते हैं। बिजली की रेखा की तरह टेढ़ी जो राजशक्ति है, उसे दिन-रात सँवार कर, पुचकार कर, भयभीत होकर, प्रशंसा करके सीधा करते हैं। नहीं तो न जाने किस पर वह गिरे! फिर महाराज! पृथ्वीनाथ! यथार्थ है! आश्चर्य! इत्यादि के क्वाथ से पुटपाक…।

जीवक : चुप रहो, बको मत, तुम्हारे ऐसे मूर्खों ने ही तो सभा को बिगाड़ रखा है! जब देखो परिहास!

वसन्तक : परिहास नहीं, अट्टहास! उसके बिना क्या लोगों का अन्न पचता है? क्या बल है तुम्हारी बूटी में? अरे! जो मैं सभा को बनाऊँ, तो क्या अपने को बिगाड़ूँ! और फिर झाड़ू लेकर पृथ्वी-देवता को मोरछल करता फिरूँ? देखो न अपना मुख आदर्श में-चले सभा बनाने, राजा को सुधारने! इस समय तो…

जीवक : तो इससे क्या, हम अपना कर्त्तव्य पालन करते हैं, दुःख से विचलित तो होते नहीं-

लोभ सुख का नहीं , न तो डर है

प्राण कर्त्तव्य पर निछावर है।

वसन्तक : तो इससे क्या? हम भी अपना पेट पालते हैं, अपनी मर्यादा बनाए रहते हैं, किसी और के दुःख से हम भी टस-से-मस नहीं होते-एक बाल-भर भी नहीं, समझे और काम कितना सम पर और सुरीला करते हैं, सो भी जानते हो। जहाँ उन्होंने आज्ञा दी कि ‘इसे मारो’, हम तत्काल ही सम पर बोलते हैं कि ‘रोऽऽऽ’

जीवक : जाओ रोओ।

वसन्तक : क्या तुम्हारे नाम को? अरे रोएँ तुम्हारे-से परोपकारी, जो राजा को समझाना चाहते हैं। घंटों बकवाद करके उन्हें भी तंग करना और अपने मुख को भी कष्ट देना। जो जीभ अच्छा स्वाद लेने के लिए बनी है, उसे व्यर्थ हिलाना-डुलाना। अरे, यहाँ तो जब राजा ने एक लम्बी-चौड़ी आज्ञा सुनाई उसी समय ‘यथार्थ है श्रीमन्’ कहकर विनीत होकर गर्दन झुका ली-बस इतिश्री। नहीं तो राजसभा में बैठने कौन देता है।

जीवक : तुम-जैसे चाटुकार लोगों का भी कैसा अधम जीवन है।

वसन्तक : और आप-जैसे लोगों का उत्तम कोई माने चाहे न माने-टाँग अड़ाए जाते हैं। मनुष्यता का ठेका लिए फिरते हैं।

जीवक : अच्छा भाई, तुम्हारा कहना ठीक है, जाओ, किसी प्रकार से पिंड छूटे।

वसन्तक : पद्मावती ने कहा कि आर्य जीवक से कह देना कि अजात का कोई अनिष्ट न होने पावेगा। केवल शिक्षा के लिए यह आयोजन है। और, माताजी से विनती से कह देंगे कि पद्मावती बहुत शीघ्र उनका दर्शन श्रावस्ती में करेंगी।

जीवक : अच्छा तो क्या युद्ध होना ध्रुव है?

वसन्तक : हाँ जी, प्रसेनजित् भी प्रस्तुत हैं। महाराज उदयन से मन्त्रणा ठीक हो गई है। आक्रमण हुआ ही चाहता है। महाराज बिम्बिसार की समुचित सेवा करने, अब वहाँ हम लोग आया ही चाहते हैं, पत्तल परसी रहे-समझे न‘ ‘ ‘

जीवक : अरे पेटू, युद्ध में तो कौए-गिद्ध पेट भरते हैं।

वसन्तक : और इस आपस के युद्ध में ब्राह्मण भोजन करेंगे, ऐसी तो शास्त्र की आज्ञा ही है। क्योंकि युद्ध से तो प्रायश्चित लगता है। फिर बिना, ह-ह-ह-ह-।

जीवक : जाओ महाराज, दण्डवत।

दोनों जाते है।

( पट – परिवर्तन )

 दशम दृश्य

स्थान – मगध में छलना का प्रकोष्ठ

छलना और अजातशत्रु।

छलना : बस थोड़ी-सी सफलता मिलते ही अकर्मण्यता ने सन्तोष का मोदक खिला दिया। पेट भर गया। क्या तुम भूल गए कि ‘सन्तुष्टश्च महीपतिः’?

अजातशत्रु : माँ, क्षमा हो। युद्ध में बड़ी भयानकता होती है; कितनी स्त्रियाँ अनाथ हो जाती हैं। सैनिक जीवन का महत्त्वमय चित्र न जाने किस षड्यन्त्रकारी मस्तिष्क की भयानक कल्पना है। सभ्यता से मानव की जो पाशव-वृत्ति दबी हुई रहती है उसी को इसमें उत्तेजना मिलती है। युद्ध-स्थल का दृश्य बड़ा भीषण होता है।

छलना : कायर! आँखें बन्द कर ले! यदि ऐसा ही था, तो क्यों बूढ़े बाप को हटाकर सिंहासन पर बैठा?

अजातशत्रु : तुम्हारी आज्ञा से, माँ! मैं आज भी सिंहासन से हटकर पिता की सेवा करने को प्रस्तुत हूँ।

देवदत्त : ( प्रवेश करके ) किन्तु अब बहुत दूर तक बढ़ आए, लौटने का समय नहीं है। उधर देखो, कोसल और कौशाम्बी की सम्मिलित सेना मगध पर गरजती चली आ रही है।

छलना : यदि उसी समय कोसल पर आक्रमण हो जाता, तो आज इसका अवकाश ही न मिलता।

देवदत्त : समुद्रदत्त का मारा जाना आपको अधीर कर रहा है; किन्तु क्या समुद्रदत्त के ही भरोसे आप सम्राट् बने थे? वह निर्बोध विलासी-उसका ऐसा परिणाम तो होना ही था। पौरुष करने वाले को अपने बल पर विश्वास करना चाहिए।

छलना : बच्चे! मैंने बड़ा भरोसा किया था कि तुम्हें भरतखण्ड का सम्राट् देखूँगी और वीरप्रसू होकर एक बार गर्व से तुमसे चरण-वन्दना कराऊँगी, किन्तु आह! पति-सेवा से भी वंचित हुई और पुत्र का…

देवदत्त : नहीं-नहीं, राजमाता दुखी न हों, अजातशत्रु तुम्हारा अमूल्य वीर-रत्न है। रण की भयानकता देखकर तो क्षण भर के लिए वीर धनंजय का भी हृदय पिघल गया था!

सहसा विरुद्धक का प्रवेश।

विरुद्धक : माता, वन्दना करता हूँ। भाई अजात! क्या तुम विश्वास करोगे-मैं साहसिक हो गया हूँ। किन्तु मैं भी राजपुत्र हूँ और हमारा-तुम्हारा ध्येय एक ही है।

अजातशत्रु : तुम्हें! कभी नहीं, तुम्हारे षड्यन्त्र से समुद्रदत्त मारा गया, और…

विरुद्धक : और कोसल-नरेश को पाकर भी मेरे कहने से छोड़ दिया, क्यों यदि मेरी मन्त्रणा लेते, तो आज तुम मगध में सम्राट् होते और मैं कोसल में सिंहासन पर बैठकर सुख भोगता। किन्तु उस दुष्ट मल्लिका ने तुम्हें…

अजातशत्रु : हाँ, उसमें तो मेरा ही दोष था। किन्तु अब तो मगध और कोसल आपस में शत्रु हैं, फिर हम तुम पर विश्वास क्यों करें

विरुद्धक : केवल एक बात विश्वास करने की है। यही कि तुम कोसल नहीं चाहते और मैं काशी-सहित मगध नहीं चाहता। देखो, सेनापति कारायण ही कोसल की सेना का नेता है। वह मिला हुआ है, और विशाल सम्मिलित वाहिनी क्षुब्ध समुद्र के समान गर्जन कर रही है। मैं खड्ग लेकर शपथ करता हूँ कि कौशाम्बी की सेना पर आक्रमण करूँगा और दीर्घकारायण के कारण जो निर्बल कोसल सेना है उस पर तुम; जिसमें तुम्हें विश्वास बना रहे। यही समय है, विलम्ब ठीक नहीं।

छलना : कुमार विरुद्धक! क्या तुम अपने पिता के विरुद्ध खड़े होगे और किस विश्वास पर….

विरुद्धक : जब मैं पदच्युत और अपमानित व्यक्ति हूँ, तब मुझे अधिकार है कि सैनिक कार्य में किसी का भी पक्ष ग्रहण कर सकूँ, क्योंकि यही क्षत्रिय की धर्मसम्मत आजीविका है। हाँ, पिता से मैं स्वयं नहीं लड़ूँगा। इसीलिए कौशाम्बी की सेना पर मैं आक्रमण करना चाहता हूँ।

छलना : अब अविश्वास का समय नहीं है। रणवाद्य समीप ही सुनाई पड़ते हैं।

अजातशत्रु : जैसी माता ही आज्ञा।

छलना तिलक और आरती करती है।

नेपथ्य में रणवाद्य। विरुद्धक और अजात की युद्ध – यात्रा

( यवनिका )

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